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Rakshita Singh
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Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"आदरणीया राजेश जी नमस्कार,   बहुत ही उम्दा गज़ल, हर शैर काबिल ए तारीफ... दिली मुबारकबाद कुबूल फरमायें ।"
Jun 28
Rakshita Singh commented on Shaikh Zubair's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय शेख़ जी,  बहुत ही बेहतरीन रचना बहुत बहुत मुबारकबाद ।"
Jun 22
Rakshita Singh commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post ताज़ा गर दिल टूटा है तो वक़्त ज़रा दीजै (४७ )
"आदरणीय गिरधारी जी नमस्कार,  काम तमाम तरह के शायद ही पीछा छोड़ें ख़ुद को ख़ुद से मिलना है तो वक़्त ज़रा दीजै ।  बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ बहुत बहुत बधाई ।"
Jun 22
Rakshita Singh commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post हो गए - ग़ज़ल
"आदरणीय बसंत जी नमस्कार,  बहुत ही सुंदर रचना बहुत बहुत बधाई ।"
Jun 22
Rakshita Singh commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय नवीन जी नमस्कार, प्रथम चार पंक्तियाँ बहुत ही शानदार पढकर आनंद आ गया ,बहुत बहुत मुबारक। "
Jun 22
Rakshita Singh commented on Sushil Sarna's blog post कर्म आधारित दोहे :
"आदरणीय सुशील जी नमस्कार,  जीवन के सत्य पर आधारित बहुत ही सुंदर दोहे.. बहुत बहुत बधाई ।"
Jun 22
Rakshita Singh commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post प्रतीक्षा
"आदरणीय गोपाल जी, नमस्कार  बहुत सुन्दर  रचना।"
Jun 22
दिगंबर नासवा commented on Rakshita Singh's blog post उन्हें मालूम नहीं ...
"आपकी कहन ठीक है ... मौलिक विचार हैं आपके पास ...  इसको ग़ज़ल के अंदाज़ में लिखने का प्रयास करें तो जरूर सफल होंगी ... इस मंच पर उपलब्ध जानकारी और आदरणीय समर साहब से मार्गदर्शन ले के प्रयास करें ... जल्दी ही अच्छी ग़ज़ल और शेर कह पाएंगी आप ... बहुत…"
Feb 20
Samar kabeer commented on Rakshita Singh's blog post उन्हें मालूम नहीं ...
"मुहतरमा रक्षिता सिंह जी आदाब,क्या ये ग़ज़ल है? अगर हाँ तो इसके अरकान क्या हैं? 'गलीचा बुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं' इस पंक्ति में 'गलीचा' ग़लत शब्द है,सहीह शब्द है "ग़ालीचा" ।"
Feb 19
Rakshita Singh posted a blog post

उन्हें मालूम नहीं ...

बड़ी खामोशी से वो कर रहें हैं गुफ्तगूमगर सब सुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!मोहब्बत के खिलें हैं फूल जिनके दर्मियाँवो काँटे चुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!यूँ शब भर जागकर सौदाई बन तन्हाई कागलीचा बुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!किये हैं ज़ब्त, वादों में जो रिश्ते प्यार केवो रिश्ते घुन रहें हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!वो हमसे पूंछते हैं इश्क करने की वज़ह मोहब्बत बेवज़ह है ये उन्हें मालूम नहीं !!मोहब्बत के बने बैठे हैं मीर,अंजुमन में -असल में इश्क क्या है खुद उन्हें मालूम नहीं है !!लगाके…See More
Feb 18

सदस्य कार्यकारिणी
शिज्जु "शकूर" commented on Rakshita Singh's blog post अल्फाज़
"अच्छी भावाभिव्यक्ति है, सादर बधाई आपको"
Feb 12
Rafique Nagori commented on Rakshita Singh's blog post अल्फाज़
"WAA"
Feb 10
Samar kabeer commented on Rakshita Singh's blog post अल्फाज़
"मुहतरमा रक्षिता सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई,बधाई स्वीकार करें ।"
Feb 8
Rakshita Singh commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल मनोज अहसास
" आदरणीय मनोज जी नमस्कार  बहुत सुंदर पंक्तियाँ, हार्दिक बधाई स्वीकार करें।"
Feb 8
Rakshita Singh posted a blog post

अल्फाज़

अल्फाज़ रूठें हैं -छोटे बच्चों की तरह,  मेरी शायरी पर -अपने पैर पटक रहे हैं,बहुत अरसे के बाद -आया हूँ मिलने इनसे,यकीनन इसलिए-रूठे हैं मुझसे कट रहे हैं !!(मौलिक व अप्रकाशित)See More
Feb 8
Rakshita Singh commented on Maheshwari Kaneri's blog post कुछ अनमोल रिश्ते   ( कहानी )
" आदरणीया कनेरी जी, नमस्कार  भावविभोर कर देने वाली सुंदर लघुकथा। "
Feb 8

Profile Information

Gender
Female
City State
Noida
Native Place
Ujhani
Profession
Fashion desinger
About me
NA

Comment Wall (1 comment)

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At 10:25pm on June 20, 2018, SudhenduOjha said…

आदरणीया सुश्री रक्षिता सिंह जी, नमस्कार। रचना आपको पसंद आई, धन्यवाद....

Rakshita Singh's Blog

उन्हें मालूम नहीं ...

बड़ी खामोशी से वो कर रहें हैं गुफ्तगू

मगर सब सुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!

मोहब्बत के खिलें हैं फूल जिनके दर्मियाँ

वो काँटे चुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!

यूँ शब भर जागकर सौदाई बन तन्हाई का

गलीचा बुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!

किये हैं ज़ब्त, वादों में जो रिश्ते प्यार के

वो रिश्ते घुन रहें हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!

वो हमसे पूंछते हैं इश्क करने की वज़ह

मोहब्बत बेवज़ह है ये उन्हें मालूम नहीं…

Continue

Posted on February 18, 2019 at 9:49am — 2 Comments

अल्फाज़

अल्फाज़ रूठें हैं -
छोटे बच्चों की तरह,  

मेरी शायरी पर -
अपने पैर पटक रहे हैं,

बहुत अरसे के बाद -
आया हूँ मिलने इनसे,

यकीनन इसलिए-
रूठे हैं मुझसे कट रहे हैं !!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Posted on February 8, 2019 at 10:25am — 4 Comments

प्रिय

तेरी मीठी बातों से ही

भरता मेरा पेट प्रिय,

जिस दिन तू गुमसुम रहती है-

भूखा मैं सो जाता हूँ !!

मैखाना, ये आँखें तेरी

पीने दे मत रोक प्रिय,

जब जब ये छलका करती हैं-

और बहक मैं जाता हूँ !!

रहता हूँ तेरे दिल में मैं

बनकर तेरा दास प्रिय,

जब भी टूटा है दिल तेरा-

तब मैं बेघर हो जाता हूँ !!

मदहोश सा कुछ हो जाता हूँ

जब होती हो तुम साथ प्रिय,

छू कर निकलूँ जो लव तेरे तो-

ज़ुल्फ़ों में खो जाता हूँ…

Continue

Posted on January 3, 2019 at 6:41pm — 4 Comments

विरह गीत

अश्रु भरे नैन,
नाहीं आवे मोहे चैन
कैसे कटें दिन रैन,
इस विरहा की मारी के...

मन में समायो है,
ये जसुदा को जायो
कोई ले चलो री गाम मोहे,
कृष्ण मुरारी के...

कर गयो टोना,
नंनबाबा को ये छोना
देख सांवरो सलौना,
गाऊँ गीत मल्हारी के...

व्याकुल सो मन
अकुलाये से नयन
बिन धीरज धरें ना
चितवन को निहारि के...

(मौलिक व अप्रकाशित)

Posted on August 19, 2018 at 8:58pm — 11 Comments

 
 
 

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