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Rakshita Singh
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Rakshita Singh commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post एक दिन आ‍ँसू पीने पर भी टैक्स लगेगा (ग़ज़ल)
"आदरणीय धर्मेन्द्र जी, सादर प्रणाम ! बहुत ही बेहतरीन गज़ल हार्दिक बधाई  स्वीकार करें।  "
Jul 20
Rakshita Singh commented on Sushil Sarna's blog post आँधियों से क्या गिला. . . . .
"आदरणीय सुशील जी, सादर प्रणाम । बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ हार्दिक बधाई स्वीकार करें। "
May 25
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"आदरणीय प्रभाकर जी सादर प्रणाम ।  वास्तव में, अब ये एक लघुकथा हुई । मेरी रचना पर आपका बहुमूल्य समय देकर  सुंदर परिमार्जन करने हेतु ह्रदय से आभार आदरणीय ।"
Dec 31, 2021
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"आदरणीय प्रभाकर जी सादर प्रणाम । लघुकथा, संस्मरण के रूप में नहीं लिखी जाती इस बात का मुझे ज्ञान ना था।  रचना  पर प्रतिक्रिया और मार्गदर्शन हेतु ह्रदय  से आभार।"
Dec 31, 2021
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"आदरणीय उस्मानी जी, सादर प्रणाम । मार्गदर्शन करने हेतु ह्रदय से आभार, आपके द्वारा बतायी गयीं बातों को ध्यान में रखकर मैं अगली बार बेहतर लिखने का प्रयास करूँगी। "
Dec 31, 2021
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
""विश्वास" ओ.बी.ओ. पर लघु कथागोष्ठी का विषय आज फिर मुझे मेरे अतीत की ओर ले गया...तब मैं सिर्फ चार साल की थी, उस रोज पापा के साथ, मैं ज़िद करके बाजार आयी थी। जब पापा दुकान में सामान खरीदने जाते तब स्कूटर की वेवीशीट पर बैठी मैं दुकानों में…"
Dec 30, 2021
Rakshita Singh left a comment for Samarth dev
"Welcome !"
Nov 29, 2021
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-80 (विषय: आकर्षण)
"उस रोज़ तुम पर हाथ उठाते-उठाते, मैं रुक गया। अचानक ज़हन में उठा सुधा का ख़याल, मुझे खींच ले गया मेरे अतीत की ओर। यही उम्र रही थी मेरी भी और यूँ ही, मैं भी खड़ा था नज़रें झुकाये... तब तुम्हारे नाना के थप्पड़ ने मेरे अबोध मन को बड़ी ठेस दी थी, पर मैं…"
Nov 29, 2021
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-136
"आदरणीय सालिक जी सादर प्रणाम।  गज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया और हौसला अफजाई के लिए ह्रदय से आभार।  अवश्य ही आप सभी गुणीजनों से सीखती रहुँगी। "
Oct 29, 2021
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-136
"आदरणीय नाहक जी, सादर प्रणाम । आपकी प्रतिक्रिया व हौसला अफजाई के लिए ह्रदय से आभार ।"
Oct 29, 2021
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-136
"आदरणीया रिचा जी नमस्कार,  गज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया और हौसला अफजाई के लिए तहेदिल से शुक्रिया ।"
Oct 29, 2021
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-136
"आदरणीय अमित जी सादर प्रणाम, गज़ल पर प्रतिक्रिया देने व हौसला अफजाई के लिए तहे-दिल से शुक्रिया इसी प्रकार मार्गदर्शन करते रहें। "
Oct 28, 2021
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-136
"आदरणीय कबीर जी सादर प्रणाम, रचना पर आपकी प्रतिक्रिया पाकर बहुत खुशी हुयी। आप सभी गुणीजनों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है और आगे भी सीखती रहुँगी मार्गदर्शन करने के लिए ह्रदय से आभार।"
Oct 28, 2021
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-136
"आदरणीय नाहक जी सादर प्रणाम,  अपने अपने मैं को लेकर वो भी चुप थे हम भी चुप एक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बरबाद किया।  बहुत ही सुंदर गज़ल, हार्दिक बधाई स्वीकार करें। "
Oct 28, 2021
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-136
"मुझको अपना कहकर तुमने मेरे दिल को शाद कियाख़ाना-ए-पुर-तारीक को आकर, तुमने आवाद किया हालातों की आँधी ने इक रोज़ नशेमन को तोड़ामेरे वादे तेरी कस्में सब कुछ ख़ाक-ओ-बाद किया बाहों से तो छूट गये पर यादों से ना छूट सकेरव ही जाने तुमने मुझको क़ैद किया…"
Oct 28, 2021
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-136
"आदरणीय अमित जी, नमस्कार।  "जितने मुँह उतनी बातें सच तो आखिर ये ही है । अपना ठौर मिटा कर हमने घर उसका आबाद किया।"  उम्दा श़ैरों के साथ बहुत ही सुंदर गज़ल हुयी हार्दिक बधाई स्वीकार करें। "
Oct 28, 2021

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NA

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At 10:25pm on June 20, 2018, SudhenduOjha said…

आदरणीया सुश्री रक्षिता सिंह जी, नमस्कार। रचना आपको पसंद आई, धन्यवाद....

Rakshita Singh's Blog

उन्हें मालूम नहीं ...

बड़ी खामोशी से वो कर रहें हैं गुफ्तगू

मगर सब सुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!

मोहब्बत के खिलें हैं फूल जिनके दर्मियाँ

वो काँटे चुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!

यूँ शब भर जागकर सौदाई बन तन्हाई का

गलीचा बुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!

किये हैं ज़ब्त, वादों में जो रिश्ते प्यार के

वो रिश्ते घुन रहें हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!

वो हमसे पूंछते हैं इश्क करने की वज़ह

मोहब्बत बेवज़ह है ये उन्हें मालूम नहीं…

Continue

Posted on February 18, 2019 at 9:49am — 2 Comments

अल्फाज़

अल्फाज़ रूठें हैं -
छोटे बच्चों की तरह,  

मेरी शायरी पर -
अपने पैर पटक रहे हैं,

बहुत अरसे के बाद -
आया हूँ मिलने इनसे,

यकीनन इसलिए-
रूठे हैं मुझसे कट रहे हैं !!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Posted on February 8, 2019 at 10:25am — 4 Comments

प्रिय

तेरी मीठी बातों से ही

भरता मेरा पेट प्रिय,

जिस दिन तू गुमसुम रहती है-

भूखा मैं सो जाता हूँ !!

मैखाना, ये आँखें तेरी

पीने दे मत रोक प्रिय,

जब जब ये छलका करती हैं-

और बहक मैं जाता हूँ !!

रहता हूँ तेरे दिल में मैं

बनकर तेरा दास प्रिय,

जब भी टूटा है दिल तेरा-

तब मैं बेघर हो जाता हूँ !!

मदहोश सा कुछ हो जाता हूँ

जब होती हो तुम साथ प्रिय,

छू कर निकलूँ जो लव तेरे तो-

ज़ुल्फ़ों में खो जाता हूँ…

Continue

Posted on January 3, 2019 at 6:41pm — 4 Comments

विरह गीत

अश्रु भरे नैन,
नाहीं आवे मोहे चैन
कैसे कटें दिन रैन,
इस विरहा की मारी के...

मन में समायो है,
ये जसुदा को जायो
कोई ले चलो री गाम मोहे,
कृष्ण मुरारी के...

कर गयो टोना,
नंनबाबा को ये छोना
देख सांवरो सलौना,
गाऊँ गीत मल्हारी के...

व्याकुल सो मन
अकुलाये से नयन
बिन धीरज धरें ना
चितवन को निहारि के...

(मौलिक व अप्रकाशित)

Posted on August 19, 2018 at 8:58pm — 11 Comments

 
 
 

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