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Rakshita Singh
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  • India
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  • Mohit mishra (mukt)
 

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राज़ नवादवी commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"आदरणीय रक्षिता जी, सुन्दर ग़ज़ल के प्रयास के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें. ये ग़ज़ल १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ की बह्र में हैं. चुनांचे नीचे के शेर पे गौर कीजिएगा. क्या ये बह्र में हैं? दानिस्ता दिल जला के यूँ तेरा पर्दानशीं होना !है तीर-ए-नीमकश इसको जिगर के…"
Jul 1
Samar kabeer commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब,आप ओबीओ के पुराने सदस्य होने के नाते ये बात अच्छी तरह जानते हैं कि इतनी मुख़्तसर टिप्पणी देना ओबीओ की परिपाटी नहीं है,उम्मीद है आप मेरी बात पर ध्यान अवश्य देंगे ।"
Jul 1
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"हार्दिक बधाई .."
Jul 1
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीया...भाव बहुतखूब हैं.."
Jun 30
Dr Ashutosh Mishra commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"आदरणीया रक्षिता सिंह जी इस मनभावन ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई सादर "
Jun 29
Samar kabeer commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"मुहतरमा रक्षिता सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । कुछ बातें आपके संज्ञान में लाना चाहूँगा । 'बस्ल की रात हे तुमसे ज़रा सा प्यार में कर लूँ' सबसे पहली बात इस मिसरे में 'बस्ल'शब्द ग़लत है,सहीह शब्द…"
Jun 29
Neelam Upadhyaya commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"आदरणीया रक्षिता जी, नमस्कार । खूबसूरत गजल कि प्रस्तुति के हार्दिक बधाई ।  "
Jun 29
Shyam Narain Verma commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"क्या बात है .... बहुत उम्दा | बधाई आप को "
Jun 29
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-96
"आदरणीय अमित जी नमस्कार, आपकी शिर्कत व हौसला अफजाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया ।।"
Jun 28
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-96
"आदरणीय आरिफ जी नमस्कार, आपकी शिर्कत के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।"
Jun 28
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-96
"ये कहानी बहुत पुरानी है। मीत है, गीत है, सुनानी है।।1।। थी जो अपनी कभी बेगानी है। वो पड़ोसी की आज रानी है।।2।। पास मेरे ये जिंदगानी हैं। रात है नींद है कहानी है।।3।। आज फिर नींद किसको आनी है। भूख है, प्यास है, मिटानी है।।4।। और भी चोट दिल पे खानी…"
Jun 28
Rakshita Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-96
Jun 28
Amit Kumar "Amit" commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"आदरणीय रक्षिता जी शानदार एक शानदार दिल में उतरने वाली गज़ल कहने के लिए बहुत-बहुत बधाइयां"
Jun 28
Rakshita Singh commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"आदरणीय शहज़ाद जी नमस्कार, आपकी शिर्कत व हौसला अफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया ।"
Jun 28
Sheikh Shahzad Usmani commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"प्यार के इज़हार और तहज़ीब पर बेहतरीन ग़ज़ल। हार्दिक बधाई आदरणीया  रक्षिता सिंह  साहिबा।"
Jun 28

Profile Information

Gender
Female
City State
Noida
Native Place
Ujhani
Profession
Fashion desinger
About me
NA

Comment Wall (1 comment)

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At 10:25pm on June 20, 2018, SudhenduOjha said…

आदरणीया सुश्री रक्षिता सिंह जी, नमस्कार। रचना आपको पसंद आई, धन्यवाद....

Rakshita Singh's Blog

जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)

जरा ज़ुल्फें हटाओ चाँद का दीदार मैं कर लूँ !

बस्ल की रात है तुमसे जरा सा प्यार मैं कर लूँ !!



बड़ी शोखी लिए बैठा हूँ यूँ तो अपने दामन में !

इजाजत हो अगरतो इनको हदके पार मैंकरलूँ!!



मुआलिज है तू दर्दे दिल का ये अग़यार कहते हैं!

हरीमे यार में खुद को जरा बीमार मैं कर लूँ !!



यूँ ही बैठे रहें इकदूजे के आगोश में शबभर !

जमाना देख ना पाये कोई दीवार मैं कर लूँ !!



तुझे लेकर के बाहों में लब-ए-शीरीं को मैं चूमूँ !

कि होके बेगरज़ अब इकनहीं…

Continue

Posted on June 28, 2018 at 3:16pm — 11 Comments

आप बीती...

इक आवारा तितली सी मैं

उड़ती फिरती थी सड़कों पे...



दौड़ा करती थी राहों पे

इक चंचल हिरनी के जैसे ...



इक कदम यहाँ इक कदम वहाँ

बेपरवाह घूमा करती थी...



कर उछल कूद ऊँचे वृक्षों के

पत्ते चूमा करती थी...



चलते चलते यूँ ही लब पर

जो गीत मधुर आ जाता था...



बदरंग हवाओं में जैसे

सुख का मंजर छा जाता था...



बीते पल की यादों से फिर

मैं मन ही मन भरमाती थी...



इठलाती थी बलखाती थी

लहराती फिर…

Continue

Posted on June 21, 2018 at 11:30pm — 16 Comments

बेबसी...

तपती धूप,

जर्जर शरीर,

फुटपाथ का किनारा,

बदन पर पसीना,

किसी के आने के इन्तजार में...

पथराई सी आँखें,

घुटनों पर मुँह रखे-

एक टक, एक ही दिशा में देख रही थीं...



- ना जाने कब से?



यूँ तो सामने दो छतरी पड़ी थीं, पर

कड़ी धूप में जल-जल के,

बदन काला पड़ गया था ....



रंग बिरंगे रूमाल -

सजे तो बहुत थे, पर

जिस्म पसीने में लथपथ था....



सफेद बाल,

तजुर्बों की गबाही दे रहे थे....

जिस्म पर लटकती खाल…

Continue

Posted on June 19, 2018 at 6:30am — 11 Comments

तुम्हारे स्पर्श से....

मैं संग चल दी उनके,

मेरा मन यहीं रह गया...

उन्होंने दिखाये होंगे हजारों ख्वाब,

पर इन आँखों में रौशनी कहाँ थी !!

कितने ही गीत सुनाये होंगे उन्होंने,

पर इन कानों के पट तो बंद हो चुके थे !!

उनके सबालों का,

जबाब भी ना दे पायी थी मैं....

क्योंकी इन होठों पे, तुम्हारा ही नाम रखा था!!

कितना आक्रोश था उनके ह्रदय में,

जब उन्होंने,

मेरे केशों को पकड़कर खींचा था...

और मैं पत्थर सी हो गयी थी,

किसी भी आघात की पीड़ा ना हुई…

Continue

Posted on June 15, 2018 at 5:12pm — 11 Comments

 
 
 

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