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अल्फाज़ रूठें हैं -
छोटे बच्चों की तरह,  

मेरी शायरी पर -
अपने पैर पटक रहे हैं,

बहुत अरसे के बाद -
आया हूँ मिलने इनसे,

यकीनन इसलिए-
रूठे हैं मुझसे कट रहे हैं !!

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by शिज्जु "शकूर" on February 12, 2019 at 7:37am

अच्छी भावाभिव्यक्ति है, सादर बधाई आपको

Comment by Rafique Nagori on February 10, 2019 at 11:31pm

WAA

Comment by रक्षिता सिंह on February 8, 2019 at 4:55pm
आदरणीय कबीर जी, नमस्कार !
रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए तहेदिल से शुक्रिया ,
लिखना सार्थक हुआ, कृपया मार्गदर्शन करते रहें। ।
Comment by Samar kabeer on February 8, 2019 at 3:51pm

मुहतरमा रक्षिता सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई,बधाई स्वीकार करें ।

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