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दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्र

ठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।
कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।

यादों में ही रह गए , हसीं उम्र के साल ।
करें अधूरी हसरतें , मन में बड़ा मलाल ।।

मुड़ - मुड़ देखे उम्र जो, पीछे छूटे मोड़ ।
क्या है अपने पास अब, क्या आए हम छोड़ ।।

रही शिकायत वक्त से, गया उम्र जो छीन ।
कहाँ वक्त की धुंध में, लम्हे गए हसीन ।।

उम्र ढली रहने लगे, दूर - दूर सब लोग ।
तनहा बैठे भोगते , तनहाई का रोग ।।

घटता जीवन देखकर, उम्र हुई बैचैन ।
सोच - सोच कर भोर भी, लगती जैसे रैन ।।

अन्तिम घट पर बैठकर, सोचे हर  इंसान ।
आखिर ढलती उम्र का, यह अन्तिम सोपान ।।

जैसे - जैसे उम्र को, लगा पास अब शाम ।
करती गुजरे वक्त की, यादें सभी सलाम ।।

पात्र दया के हो गए, ढली उम्र जब यार ।
दूर -दूर होने लगा, अपनों का संसार ।।

जीवन में कभी उम्र की, थमी नहीं रफ्तार ।
लड़ते - लड़ते  उम्र यह,  आखिर जाती हार ।।

सुशील सरना / 6-4-26
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by आशीष यादव on May 11, 2026 at 9:19am

आदरणीय सुशील जी, जीवन के यथार्थ को दिखाते दोहे बेहतरीन बने हैं। 

हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।

Comment by Sushil Sarna on April 17, 2026 at 1:03pm

आदरणीय विजय निकोर जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय 

Comment by vijay nikore on April 14, 2026 at 4:15pm

भाई सुशील जी, सारे दोहे जीवन के यथार्थ में डूबे हुए हैं.. हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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