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अश्रु भरे नैन,
नाहीं आवे मोहे चैन
कैसे कटें दिन रैन,
इस विरहा की मारी के...

मन में समायो है,
ये जसुदा को जायो
कोई ले चलो री गाम मोहे,
कृष्ण मुरारी के...

कर गयो टोना,
नंनबाबा को ये छोना
देख सांवरो सलौना,
गाऊँ गीत मल्हारी के...

व्याकुल सो मन
अकुलाये से नयन
बिन धीरज धरें ना
चितवन को निहारि के...

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 24, 2018 at 3:07pm

गीत सुंदर बन पड़ा है।

शुभकामनाएँ

Comment by santosh khirwadkar on August 22, 2018 at 10:12pm

वाह्ह्ह क्या बात है ...बहुत सुंदर गीत!! बधाई!

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on August 22, 2018 at 7:18pm

आदरणीया रक्षिता जी विरह गीत पढ़कर बहुत आनन्द आया बहुत बहुत बधाई

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 22, 2018 at 1:38pm

आ0 रक्षिता सिंहः जी बहुत अच्छी रचना के लिए बधाई आपको ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 20, 2018 at 9:49pm

आ. रक्षिता जी, सुंदर रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 20, 2018 at 8:42pm

सुंदर रचना हुई है | हार्दिक बधाई आदरणीया |

Comment by Samar kabeer on August 20, 2018 at 5:25pm

मुहतरमा रक्षिता सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

पटल पर बहुत समय बाद आपका आना हुआ,पिछली पोस्ट पर आपके प्रतिउत्तर की प्रतीक्षा है ।

Comment by Neelam Upadhyaya on August 20, 2018 at 3:42pm

बहुत ही अच्छी  रचना ।  प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें रक्षिता जी। 

Comment by Mohammed Arif on August 20, 2018 at 2:27pm

आदरणीया रक्षिता जी आदाब,

                        बहुत ही लाजवाब विरह गीत । अच्छा किया जो आपने ने केंद्र में मुरारी को रख लिया । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by रक्षिता सिंह on August 19, 2018 at 10:45pm

आदरणीय मिर्ज़ा जी, बहुत बहुत धन्यवाद!!

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