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जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)

जरा ज़ुल्फें हटाओ चाँद का दीदार मैं कर लूँ !
बस्ल की रात है तुमसे जरा सा प्यार मैं कर लूँ !!

बड़ी शोखी लिए बैठा हूँ यूँ तो अपने दामन में !
इजाजत हो अगरतो इनको हदके पार मैंकरलूँ!!

मुआलिज है तू दर्दे दिल का ये अग़यार कहते हैं!
हरीमे यार में खुद को जरा बीमार मैं कर लूँ !!

यूँ ही बैठे रहें इकदूजे के आगोश में शबभर !
जमाना देख ना पाये कोई दीवार मैं कर लूँ !!

तुझे लेकर के बाहों में लब-ए-शीरीं को मैं चूमूँ !
कि होके बेगरज़ अब इकनहीं सौबार मैं कर लूँ!!

दानिस्ता दिल जला के यूँ तेरा पर्दानशीं होना !
है तीर-ए-नीमकश इसको जिगर के पार मैं कर लूँ !!

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by राज़ नवादवी on July 1, 2018 at 7:29pm

आदरणीय रक्षिता जी, सुन्दर ग़ज़ल के प्रयास के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें. ये ग़ज़ल १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ की बह्र में हैं. चुनांचे नीचे के शेर पे गौर कीजिएगा. क्या ये बह्र में हैं?

दानिस्ता दिल जला के यूँ तेरा पर्दानशीं होना !
है तीर-ए-नीमकश इसको जिगर के पार मैं कर लूँ !!

Comment by Samar kabeer on July 1, 2018 at 5:55pm

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब,आप ओबीओ के पुराने सदस्य होने के नाते ये बात अच्छी तरह जानते हैं कि इतनी मुख़्तसर टिप्पणी देना ओबीओ की परिपाटी नहीं है,उम्मीद है आप मेरी बात पर ध्यान अवश्य देंगे ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 1, 2018 at 5:18pm

हार्दिक बधाई ..

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 30, 2018 at 1:52pm

अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीया...भाव बहुतखूब हैं..

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 29, 2018 at 4:14pm

आदरणीया रक्षिता सिंह जी इस मनभावन ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई सादर 

Comment by Samar kabeer on June 29, 2018 at 3:12pm

मुहतरमा रक्षिता सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

कुछ बातें आपके संज्ञान में लाना चाहूँगा ।

'बस्ल की रात हे तुमसे ज़रा सा प्यार में कर लूँ'

सबसे पहली बात इस मिसरे में 'बस्ल'शब्द ग़लत है,सहीह शब्द "वस्ल" है, दूसरी बात,'वस्ल' शब्द से मिसरे की लय बाधित हो रही है,इस मिसरे को यों कर सकती हैं :-

'मिलन की रात है तुमसे ज़रा सा प्यार मैं कर लूँ'

दूसरे शैर के ऊला में 'शौखी' एक वचन है, इसलिये सानी मिसरे में 'इनको' की जगह "इसको" करना उचित होगा ।

5वें शैर के सानी मिसरे में 'अब' की जगह "ये" कर लें ।

कुछ शब्दों के बीच स्पेस नहीं है देखियेगा ।

Comment by Neelam Upadhyaya on June 29, 2018 at 1:03pm

आदरणीया रक्षिता जी, नमस्कार । खूबसूरत गजल कि प्रस्तुति के हार्दिक बधाई ।

 

Comment by Shyam Narain Verma on June 29, 2018 at 11:23am
क्या बात है .... बहुत उम्दा | बधाई आप को 
Comment by Amit Kumar "Amit" on June 28, 2018 at 5:52pm
आदरणीय रक्षिता जी शानदार एक शानदार दिल में उतरने वाली गज़ल कहने के लिए बहुत-बहुत बधाइयां
Comment by रक्षिता सिंह on June 28, 2018 at 5:25pm

आदरणीय शहज़ाद जी नमस्कार,
आपकी शिर्कत व हौसला अफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया ।

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