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ग़ज़ल

1222 1222 1222 122

करेगा दम्भ का यह काल भी अवसान किंचित ।

करें मत आप सत्ता का कहीं अभिमान किंचित ।।

क्षुधा की अग्नि से जलते उदर की वेदना का ।

कदाचित ले रहा होता कोई संज्ञान किंचित ।।

जलधि के उर में देखो अनगिनत ज्वाला मुखी हैं।

असम्भव है अभी से ज्वार का अनुमान किंचित।।

प्रत्यञ्चा पर है घातक तीर शायद मृत्यु का अब ।

मनुजता पर महामारी का ये संधान किंचित ।।

चयन पर आज जनता की यही स्तब्धता है ।

प्रकट कैसे अहं का आप में प्रतिमान किंचित ।।

बिकी हैं राष्ट्र की सम्पत्तियाँ और स्मिता भी ।

चुनावों तक रहेगा देश को यह ध्यान किंचित ।।

प्रकृति के मर्म के उपहास का परिणाम ही है ।

प्रलय करने चला है युद्ध का सम्मान किंचित ।।

शवों पर काल का यह ताण्डव तुम रोक लेते ।

हृदय में सृष्टि का होता कहीं स्थान किंचित ।।

विवशता की परिधि का टूटना है सत्य अंतिम ।

यहाँ करता है मानव प्रति दिवस विषपान किंचित ।। -

नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अ प्रकाशित

शब्दार्थ - किंचित -(विशेषण )थोड़ा, कुछ, क्षणिक, किंचित- (क्रिया विशेषण ) अल्प मात्रा में ,बहुत कम

Views: 632

Comment

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Comment by Naveen Mani Tripathi on May 9, 2020 at 12:15pm
आ0 डॉ छोटे लाल सिंह साहब तहेदिल से शुक्रिया ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on May 9, 2020 at 12:14pm
आ0 लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर साहब हार्दिक आभार ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on May 9, 2020 at 12:13pm
आ0 सूबे सिंह सुजान साहब विशेष आभार।
Comment by Naveen Mani Tripathi on May 9, 2020 at 12:12pm
आ0 समर कबीर साहब सप्रेम नमन के साथ आभार ।
Comment by सूबे सिंह सुजान on May 6, 2020 at 5:17am

नवीन जी,शुद्ध हिन्दी में ग़ज़ल और वह भी महामारी पर कही गई है बहुत सुंदर रचना बन पड़ी है ।बहुत बधाई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 4, 2020 at 1:31pm

आ. भाई नवीन जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on May 4, 2020 at 11:44am

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by सूबे सिंह सुजान on May 3, 2020 at 8:14pm

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई हो 

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on May 3, 2020 at 7:32pm

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी यथार्थ के धरातल पर बहुत ही अच्छी गज़ल लगी ,बहुत बहुत बधाई

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