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रसाला छंद एक प्रयास – (भ न ज भ ज ज ल)

जीवन विषम अबोध , जानकर ना डर मानव |

प्राप्त प्रथम कर ज्ञान, ज्ञान बिन पार न हो भव ||

अंतर तल अँधियार , दूर कर रोशन हो मग |

हो जगमग हर पंथ , पंथ अति रोशन हो जग ||

 

श्रेष्ठ जटिल हर कर्म, है मनुज उन्नति दायक |

भूल बिसर मत कृत्य, सत्य हर भूपति नायक ||

भूमि सतह पर स्वर्ग, कर्म बिन हो कब संभव |

जीवन पथ पर कर्म , धर्म सम भूल न मानव ||

 

मानव परहित कार्य , हैं न बस दाहकता दुख |

कष्ट सहन कर लाख, एक यदि जीवन का सुख ||

लेकर चल यह लक्ष्य , दीन जन हों खुश मानव |

साथ सजह रख ध्यान, व्यक्ति मत तू बन दानव ||

 

मौलिक/अप्रकाशित.

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Comment by Ashok Kumar Raktale on September 24, 2017 at 7:20pm

प्रस्तुति को सराहने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय मोहम्मद आरिफ साहब. रसाला छंद रोला का ही एक प्रकार है. इसका गण सूत्र  मैंने अपनी प्रस्तुति के शीर्षक के साथ दिया ही है. (भ न ज, भ ज ज ल ) सादर.

Comment by Mohammed Arif on September 23, 2017 at 10:14am
आदरणीय अशोक रक्ताले जी आदाब, बेहतरीन सीख देता रसाला छंद । उम्मीद भी जगाता है और विश्वास भी । इस छंद के बारे में थोड़ा और बताइए । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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