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गीत... हर आहट पर यूँ लगता है जैसे हों साजन आये-बृजेश कुमार 'ब्रज'

हर आहट पर यूँ लगता है
जैसे हों साजन आये

घिर घिर आये कारे बादल
वैरी कोयल कूक उठी
अरमानों ने अंगड़ाई ली
और करेजे हूक उठी
बागों बीच पपीहा बोले
अमुआ डाली बौराये
हर आहट पर यूँ लगता है
जैसे हों साजन आये

खिड़की पर मायूसी पसरी
दरवाजों ने आह भरी
आँगन ज्यूँ शमशान हुआ है
कोने कोने डाह भरी
कब तक साँस दिलासा देगी
कब तक पायल भरमाये
हर आहट पर यूँ लगता है
जैसे हों साजन आये

फिर दिल ने आवाज लगाई
गौर करो इस अर्जी पर
कितने अरमानों से बुन बुन
उर की बंजर धरती पर
मैंने कितने गीत चुने हैं
कितने अफसाने गाये
हर आहट पर यूँ लगता है
जैसे हों साजन आये

तुम बिन सारा जग बिसराया
बस इतनी सी बात हुई
दिन कट जाता जैसे तैसे
वैरन काली रात हुई
मैं बिरहन बिरहा की मारी
कौन मुझे अब समझाये
हर आहट पर यूँ लगता है
जैसे हों साजन आये
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Views: 1464

Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 5, 2017 at 11:04am
आदरणीय विजय जी आपका हार्दिक धन्यवाद..
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 4, 2017 at 6:53pm

आ० ब्रज जी ,  हिदी में  १६,१४  जिसका अंत २२ से हो ककुभ छंद कहलाता है . आप आद्यांत २२२२२ क्यों निभा रहे हैं . यह तो उर्दू शायरी की बहरे मीर है . तो क्या आप गजल के मीटर पर हिन्दी गीत लिख रहे हैं . हिन्दी का मात्रा तनिक हटकर है . मैं कुछ  उदाहरण देता हूँ -

कूक उठी  [ २१ १२] और करेजे  हूक़  उठी [२१ १२२ २१ १२] किसी शब्द का अंत  हृस्व  हो और फिर अनुवर्ती शब्द का प्रथम वर्ण हृस्व हो तो उर्दू शायरी में उसे दीर्घ मान लेते हैं , हालाँकि वहां भी इसे अच्छा नही माना जाता.  हिन्दी में यह छूट बिलकुल नहीं है . अतः आप यदि हिन्दी गीत लिख रहे हैं तो ककुभ छंद में लिखे . इसमें दो राय नही कि आपके भाव सराहनीय है . गीत बहुत अच्छा है . और यदि आप extra effort डालना ही चाहते है तो थोड़ी मेहनत और करे तथा मात्रिक व्यवहार हिन्दी के अनुसार करें . सादर .

Comment by vijay nikore on November 4, 2017 at 12:25pm

गीत सुन्दर है, भाव प्रभावशाली हैं। हार्दिक बधाई।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 3, 2017 at 10:00pm
आदरणीय सुशील सरना जी गीत को ह्रदय से महसूस करने के लिए आपका ह्रदय से अभिनन्दन वंदन..स्नेह बनाएं रखें..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 3, 2017 at 9:56pm
आपकी पैनी नजर काबिले तारीफ हैं आदरणीया डा.प्राची जी..तीसरे बन्ध की तीसरी पंक्ति में 2 मात्राएँ कम रह गई..साथ ही तुकान्ता भी भिन्न है ध्यानाकर्षण के लिए आपका हार्दिक आभार..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 3, 2017 at 9:52pm
दिल की गहराइयों से आभार व्यक्त करता हूँ आदरणीय नादिर खान जी..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 3, 2017 at 9:50pm
रचना पटल पे आपका स्वागत है आदरणीय लक्ष्मण रामानुज जी..स्नेह बनाएं रखें..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 3, 2017 at 9:48pm
स्नेह बनाएं रखें आदरणीया राजेश कुमारी जी..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 3, 2017 at 9:47pm
उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय मोहित जी..
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 3, 2017 at 9:46pm
आदरणीय आरिफ जी आपका हार्दिक आभार..सादर

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