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बरगद का इक बूढ़ा पेड़

 

खिड़की खुलते ही नज़र आता था सोसायटी के पीछे खड़ा 

बरगद का इक बूढ़ा पेड़  

हर मौसम में एक नयी पोशाक पहने |

 

शाखें हिलाकर हाथ की तरह  

जाने किस किसको बुला लिया करता था,

अनजान से चेहरे आते

और कुरेदकर लिख जाते

अपनी ख्वाहिशें और ग़म उसके तनों पर

चाँद जब परेड करता रात में

जाने कितने राज़ दफ्न कर दिया करता था वो अपने सीने में |

 

मग़र कल शाम...

कमेटी ने काटकर इसे  गिरवा दिया है

कहते हैं इसकी जड़ों के टाँके उनके घरों की ज़मीन पर खुलते हैं

रात भर चीखता रहा है वो बरगद ...

 

खिड़की खोलने में अब डर सा लगता है मुझको ....

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on June 18, 2011 at 2:21pm
एक मार्मिक काव्य ... आज के सच के बेहद करीब सही कहा बंधू बिना वृक्षों के हमारा जीवन कहा और जीवन में रस कहाँ ?? अब ये तो व्यवस्था  को सोचना होगा की हम कहाँ जा रहे हैं ?? प्रभावी रचना साधुवाद !!!
Comment by Veerendra Jain on June 16, 2011 at 11:22am
Ambarish ji...bahut bahut shukriya...
Comment by Veerendra Jain on June 16, 2011 at 11:21am
Bahut bahut aabhar...Amitesh ji...
Comment by Veerendra Jain on June 16, 2011 at 11:20am
Tilak Sir...aap gunijano ka margdarshan sadaiv se sahaayak raha hai....bahut bahut dhanywad....
Comment by Er. Ambarish Srivastava on June 16, 2011 at 1:08am

बहुत खूब मित्र ! जैसा कि विद्वजनों नें कहा है चिंतन की इसी धारा में बहते रहें.......साधुवाद ..:)) 

Comment by अमि तेष on June 15, 2011 at 2:54pm
hardaysparsi...

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on June 15, 2011 at 1:14pm
बहुत खूबसूरत। काव्‍य में इसी चिंतन के स्‍तर को बनाये रखें।

कृपया ध्यान दे...

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