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'उन्होंने एक लघु कथा लिखी।फेसबुक पर आ गयी।हठात उसपर मेरी नजर पड़ी। शीर्षक,समापन सब मेरे थे।बापू की मूर्त्ति के नीचे ही वार्त्तालाप हुआ था।मैं चकित था।सुबह मैंने लिखी,अपराह्न तक दोस्त ने दुहरा दी।बापू की जयकार बोलने का इससे बढ़िया दूसरा तरीका शायद ही हो।'---
मधुकर जी एक ही साँस में इतना सब कुछ बोल गए।
'क्या जमाना आ गया ?', माधवी पति का उद्विग्न चेहरा देखकर बोली।
.
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on December 17, 2017 at 10:19pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय आरिफ भाई।

Comment by Mohammed Arif on December 17, 2017 at 9:56pm

आदरणीय मनन कुमार जी आदाब,

                             बहुत ही बढ़िया और सारगर्भित अतिसूक्ष्म लघुकथा । साहित्य में चोरी कोई नई बात नहीं है । साहित्य की चोरी अब और भी आसान हो गई है जब से इतने सारे सोश्यल प्लेट फार्म अस्तित्व में आ गए हैं । हमें तो यह भी पता नहीं है कि हमारी रचना कौन कहाँ चुराकर पढ़ रहा है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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