For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल (यूँ नहीं मैं ने ज़माने से बग़ावत की है )

(फाइलातुन -फइलातुन -फइलातुन -फेलुन)

यूँ नहीं मैं ने ज़माने से बग़ावत की है |
मुझ से उस शोख़ ने बे लौस मुहब्बत की है |

दिल ने मजबूर बहुत कर दिया मुझको वर्ना
मैं ने कब मर्ज़ी से उस शोख़ की हसरत की है |

मुझ से उम्मीद वफ़ा की है उसी को यारो
उम्र भर जिसने मेरे साथ अदावत की है |

रहनुमाई के लिए मैं ने चुना था जिसको
हाए उसने भी मेरे साथ सियासत की है |

सोच लेना वो कोई ग़ैर नहीं अपने हैं
तुमने जिनसेमेरीमहफ़िल में शिकायत की है |

यक बयक हो गये तब्दील किसी के तेवर
मुझ पे क्या ख़ूब अज़ीज़ों ने इनायत की है |

करते फिरते हैं बुराई मेरी तस्दीक़ वही
मैं ने कब ज़ाहिरा उनकी कोई फ़ितरत की है |


( मौलिक व अप्रकाशित )

Views: 833

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 31, 2017 at 10:17pm

मुहतरम जनाब तेज वीर साहिब , ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफज़ाई
का बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by TEJ VEER SINGH on December 31, 2017 at 6:44pm

हार्दिक बधाई आदरणीय तस्दीक अहमद खान साहब जी।आदाब ।बेहतरीन गज़ल।

रहनुमाई के लिए मैं ने चुना था जिसको 
हाए उसने भी मेरे साथ सियासत की है |

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 29, 2017 at 8:55pm

जनाब अफ़रोज़ साहिब, हर शायर के सोचने का अंदाज़ अलग होता है ,ज़रूरी नहीं कि हर शायर एक तरह से सोचे । उस शोख की हसरत करने में आशिक़ की मर्ज़ी नहीं है मगर वो अपने दिल के हाथों मजबूर है ,इस लिए ऐसा करना पड़ रहा है । बाक़ी कोई किस तरह सोचता है ,इस पर किसी का कोई अख़्तियार नहीं होता---सादर

Comment by Afroz 'sahr' on December 29, 2017 at 12:31pm
जनाब तस्दीक़ एहमद खा़न साहिब आदाब दूसरा शेर
"दिल ने मजबूर बहुत कर दिया मुझको वर्ना"
"मैंने कब मर्ज़ी से उस शोख़ की हसरत की है"
इस शेर के ऊला मिसरे में दिल एक मर्कज़ी किरदार में है।
ये बात सच है कि इंसान दिल के हाथों मजबूर हो जाता है।
लेकिन हर मर्ज़ी और ना मर्ज़ी का फैसला दिल ही करता है।
जैसा कि ऊला मिसरे से मालूम हो रहा है।
ऊला मिसरे में कही हुई बात की सानी मिसरी ख़िलाफ़ वर्ज़ी कर रहा है। "मैने कब मर्ज़ी से उस शोख़ की हसरत की है"
में ब ज़ात ए ख़ुद की मर्ज़ी का ज़िक्र है। जो कि दिल की मर्ज़ी के अपोज़िट है। यानि कि दो, मर्जी़ का एक दिल की दूसरी ब ज़ात ए ख़ुद की मर्ज़ी ये कैसे मुमकिन है।
""मक्ता पर आपकी बात सही है"" सादर,,
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 29, 2017 at 11:27am

जनाब अफ़रोज़ साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत, मश्वरे और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ।

महरबानी करके बताने की ज़हमत करें कि शेर 2 मुहमिल कैसे है?

मेरे आखरीं शेर के सानी मिसरे  का मफ़हूम साफ है जो आपकी समझ में नहीं आ रहा है । वो मेरी  सबसे बुराई  कर रहे हैं मगर मैं ने जो उनकी फितरत है ,उसे कब लोगों में ज़ाहिर किया है , आपके मिसरे के हिसाब से फितरत की जा रही है ,फितरत की नहीं जाती , यह तो होती है हर शख़्स की 

अलग अलग । शायद आप  समझ गए होंगे ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 29, 2017 at 10:50am

मुहतरम जनाब कालीपद साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Afroz 'sahr' on December 28, 2017 at 11:24pm
जनाब तस्दीक़ एहमद ख़ान साहिब अच्छी ग़ज़ल हुई। मुबारकबाद कुबूल करें।
दूसरा शेर मुहमिल है। पाँचवे शेर के सानी मिसरे को और कसा जा सकता है। मक्ते का सानी मिसरा "मैंने कब ज़ाहिरा उनकी कोई फ़ितरत की है। से ये भाव आ रहा है कि फ़ितरत छुपा कर की है। ये मिसरा यूँ होना चाहिए
" मैंने हरगिज़ कभी उनकी नहीं फ़ितरत की है"
Comment by Kalipad Prasad Mandal on December 28, 2017 at 10:16pm

आ तस्दीक अहमद खान साहिब ,आदाब  बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर  मुबारकबाद कुबूल करें 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 28, 2017 at 5:26pm

जनाब महेंद्र कुमार साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 28, 2017 at 5:25pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ साहिब , ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
" कोई  सुनता नहीं मेरी वो असर है साईं   अब तो दीदावर न कोई न वो दर है…"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"कोख से मौत तलक रात अमर है साईंअपने हिस्से में भला कौन सहर है साईं।१।*धूप ही धूप मिली जब से सफर है…"
11 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"सादर अभिवादन।"
11 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"स्वागतम"
12 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  प्रस्तुत नवगीत को आपसे मिला उत्साहवर्द्धन हमें प्रयासरत रखेगा, आदरणीय अशोक…"
15 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post कौन क्या कहता नहीं अब कान देते // सौरभ
"  आदरणीय रवि भसीन ’शाहिद’ जी, प्रस्तुति पर आपका स्वागत है। इस गजल को आपका अनुमोदन…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आदरणीय लक्ष्मण भाई, नमस्कार। इस प्रस्तुति पे हार्दिक बधाई स्वीकार करें। हर शेर में सार्थक विचार…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Saurabh Pandey's blog post कौन क्या कहता नहीं अब कान देते // सौरभ
"आदरणीय सौरभ पांडे जी, नमस्कार। बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है आपने, इस पे शेर-दर-शेर हार्दिक बधाई स्वीकार…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण भाई, नमस्कार। काफ़ी देर के बाद मिल रहे हैं। इस सुंदर प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अशोक कुमार जी, नमस्कार। इस सुंदर ग़ज़ल पे हार्दिक बधाई स्वीकार करें। /रास्तों …"
yesterday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

प्रवाह, बुद्धिमत्ता और भ्रम का खेल सिद्धांत (लेख)

मनुष्य और भाषा के बीच का संबंध केवल अभिव्यक्ति का नहीं है, अगर ध्यान से सोचें तो यह एक तरह का खेल…See More
Sunday
pratibha pande replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय सौरभ जी इस छन्द प्रस्तुति की सराहना और उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार "
Sunday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service