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भयभीत परम्परा
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"वो कांप रहे हैं।"
एक उड़ती खबर उनके कानों में पहुँची है ।यहाँ अब एक बड़ा मॉल बनेगा ।
बड़े बड़े शॉपिग काम्प्लेक्स ,होटल ,सिनेप्लेक्स ,ब्रांडेड शोरूम,स्विमिंग पूल ,पार्किंग !
विकास की बहती बयार के झोंकें कस्बे में चल रहे हैं ।
वो सुन्न हो चुके हैं ।कभी वो बहुत चहकते थे।
जब किसान हल चलाता था ।गुड़-चना ले भोरे भोरे आता था ।
फसल काटने वाली स्त्रियां हँसी -ठिठोली करते गीत गाती थीं !
बच्चे बीच की पगडंडियों पर दौड़ते ,खेलते थे ।
तब वो खिलखिलाते थे।
अब मौन हैं।किससे बतियाए ?
कर्ज़ को समर्पित हो चुकी है किसान की आत्महत्या ।
आत्महत्या से जो बच गए कहीं रिक्शा खींच रहे हैं ।
स्त्रियां अब शहरों के घरों में काम वाली कहलाती हैं ।
बच्चे अब किसी स्लम की झुग्गियों में दुबके पड़े हैं ।
उन्होनें सुना सत्ता और पूंजीवाद साथ साथ खड़े हैं !
कुछ वृद्ध बचे हैं --थके ,हताश ,उनकी तरह अपने अंत से थरथराये!
गाँव के खेत डरे हुए है ।थर थर कांप रहें हैं ।उनका आर्तनाद कौन सुनेगा ! अन्तिम बार उन्होंने ने खुद को निहारा !
कल उनकी हरियाली कंक्रीट होने वाली है

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by डॉ संगीता गांधी on January 11, 2018 at 7:34pm
हार्दिक धन्यवाद आदरणीय सतविंद्र राणा जी ।
ये सभी सामयिक प्रश्न हैं ।जो बदलती व्यवस्था के चरित्र को से जुड़े हैं ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 11, 2018 at 7:29pm

हार्दिक बधाई आदरणीया संगीता गांधी जी,इस बेहतरीन रचना के लिए। कई यक्ष प्रश्न उठा रही है यह।

Comment by TEJ VEER SINGH on December 31, 2017 at 6:20pm

हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ संगिता गांधी जी।बेहतरीन प्रस्तुति। एक कड़वी सच्चाई से रूबरू कराती रचना।

Comment by डॉ संगीता गांधी on December 29, 2017 at 11:35pm
हार्दिक धन्यवाद आदरणीय ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 29, 2017 at 10:41pm

बहुत बढ़िया उम्दा सार्थक प्रस्तुति के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद आदरणीया संगीता गांधी जी।

Comment by डॉ संगीता गांधी on December 29, 2017 at 10:01am
धन्यवाद ।आपने सही कहा आर्थिक आतंकवाद का स्वरूप दिन ब दिन देश को डस रहा है । एक आम व्यक्ति अपनी विरासत से वंचित होकर दयनीय जीवन की ओर धकेला जा रहा है ।कथा में डरे हुए खेत यही संकेत देते हैं।
Comment by Mohammed Arif on December 29, 2017 at 8:08am

आदरणीया संगीता जी आदाब,

                            तेज़ी से बढ़ता पूँजीवाद का आतंक हमरे खेत-खलिहान, परिवार और विरासत को लूट रहा है । देश में पूँजीपति आर्थिक आतंक मचा रहे हैं । सत्ताधारी सरकारें इनकी ग़ुलाम और रखैल बन गईं हैं । देश किसान आत्महत्या का उत्सव मना रहा है । हमारी धरोहर की किसी भी फिक्र नहीं है । देश में उपज का दायरा लगातार कम होता जा रहा है । बड़ी चिंता वाली बात है । खेत का मानवीकरण करके सबकुछ मार्मिक तरीके से कह दिया आपने । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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