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ग़ज़ल -महात्मा जो हैं, वो करम देखते हैं=कालीपद 'प्रसद'

काफिया : अम   रदीफ़: देखते हैं

बह्र : १२२  १२२  १२२  १२२

महात्मा जो हैं, वो करम देखते हैं

अधम लोग उसका, जनम देखते हैं |

बहुत है दुखी कौम  गम देखते हैं

सुखी कौम गम को तो’ कम देखते हैं |

अतिथि मुल्क में जो भी’ आये यहाँ पर  

मनोहर बियाबाँ, इरम देखते है |

दिशा हीन सब नौजवान और करते क्या

वज़ीरों के’ नक़्शे कदम देखते हैं |

किया देश हित काम जनता ही’ देखे

विपक्षी तो’ केवल सितम देखते हैं |

तमाशा वही फ़क्त आईना’ दारी

वही “काली’” तस्वीर हम देखते हैं |

बियाबाँ=कानन, जंगल

इरम=स्वर्ण भूमि

आईना’दारी=आत्म श्रिंगार

 

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 20, 2018 at 2:42pm

अच्छी लगी ग़ज़ल आदरणीय शिल्प पक्ष पे तो गुणीजन राय देंगे।सादर

Comment by Mohammed Arif on January 17, 2018 at 5:25pm

आदरणीय कालीपद प्रसाद जी आदाब,

                           अच्छी ग़ज़ल का प्रयास । ग़ज़ल अभी और समय चाहती है । दूसरे शे'र के उला और सानी दोनों मिसरों में तथा तीसरे शे'र में भी ऐब-ए-तनाफुर है , देखिएगा । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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