For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

दुश्मन भी अगर दोस्त हों तो नाज़ क्यूँ न हो

...

दुश्मन भी अगर दोस्त हों तो नाज़ क्यूँ न हो,
महफ़िल भी हो ग़ज़लें भी हों फिर साज़ क्यूँ न हो ।

है प्यार अगर जुर्म मुहब्बत क्यूँ बनाई,
गर है खुदा तुझमें तो वो, हमराज़ क्यूँ न हो ।

रखते हैं नकाबों में अगर राज़-ए-मुहब्बत,
जो हो गई बे-पर्दा तो आवाज़ क्यूँ न हो ।

दुश्मन की कोई चोट न होती है गँवारा,
गर ज़ख्म देगा दोस्त तो नाराज़ क्यूँ न हो ।

संगीत की तरतीब में तालीम बहुत है,
फिर गीत ग़ज़ल में सही अल्फ़ाज़ क्यूँ न हो ।

झेला है उसने इश्क़-ए-समंदर में पसीना,
वो ईंट से रोड़ा बना अंदाज़ क्यूँ न हो ।

इंसान की औलाद हूँ, न हिन्दू मुसलमाँ,
है 'हर्ष' मेरा नाम तो फ़ैयाज़ क्यूँ न हो ।

*****

मौलिक व अप्रकाशित

हर्ष महाजन

Views: 823

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Harash Mahajan on March 26, 2018 at 10:59pm

आदरणीय कबीर जी प्रोत्साहन के लिए दिली शुक्रिया । सर आप गुरुजनों रहनुमाई में हर अहसास संवारना चाहता हूँ । छोटी सी छोटी गलती भी अगर हो तो बताइयेगा ज़रूर सर ।बहुत बहुत शुक्रिया । 

सादर ।

Comment by Samar kabeer on March 26, 2018 at 10:46pm

क़वाफ़ी के लिहाज़ से अब आपकी ग़ज़ल ठीक हो गई, कुछ शिल्प की कमजोरियां हैं जो धीरे धीरे आप क़ाबू पा लेंगे ।

एक क़ाफिये के बारे में पहले नहीं बतया था कि 'नाराज़' क़ाफ़िया उर्दू के हिसाब से सौती क़ाफ़िया है, लेकिन हिन्दी में चल जायेगा ,प्रयास करते रहें ।

Comment by Harash Mahajan on March 26, 2018 at 10:35pm

आदरणीय समर कबीर जी आदाब । सर आपके नर्गदर्शन में मैं ओहिर से एक कोशिश आपके समक्ष लेकर आया हूँ । अपने कीमती वक़्त में से कुछ वक्त इधर भी दीजियेगा । 

सादर ।

...

दुश्मन भी अगर दोस्त हों तो नाज़ क्यूँ न हो,
महफ़िल भी हो ग़ज़लें भी हों फिर साज़ क्यूँ न हो ।

है प्यार अगर जुर्म मुहब्बत क्यूँ बनाई,
गर है खुदा तुझमें तो वो, हमराज़ क्यूँ न हो ।

रखते हैं नकाबों में अगर राज़-ए-मुहब्बत,
जो हो गई बे-पर्दा तो आवाज़ क्यूँ न हो ।

दुश्मन की कोई चोट न होती है गँवारा,
गर ज़ख्म देगा दोस्त तो नाराज़ क्यूँ न हो ।

संगीत की तरतीब में तालीम बहुत है,
फिर गीत ग़ज़ल में सही अल्फ़ाज़ क्यूँ न हो ।

झेला है उसने इश्क़-ए-समंदर में पसीना,
वो ईंट से रोड़ा बना अंदाज़ क्यूँ न हो ।

इंसान की औलाद हूँ, न हिन्दू मुसलमाँ,
है 'हर्ष' मेरा नाम तो फ़ैयाज़ क्यूँ न हो ।

Comment by Harash Mahajan on March 26, 2018 at 10:31pm

आदरणीय सुरेंद्र जी आदाब । शुक्रिया आप मेरी इस रचना पर आए और अपना कीमती वक़्त दिया। जिस मुतल्लक आपने फरमाया  उसी दिशा में गुरु तुल्यआदरणीय निलेश जी और आदरणीय समर जी के मार्गदर्शन में ही आगे बढ़ने का प्रयास हो रहा है ।

सादर

Comment by नाथ सोनांचली on March 26, 2018 at 8:30pm

आद0 हर्ष महाजन जी आपके प्रयास की तारीफ करता हूँ पर काफ़ियाबन्दी बन्दी गलत हो गयी है। आप आद0 आली जनाब समर साहब और भाई नीलेश जी के बातों का संज्ञान लीजिये और इस मंच ग़ज़ल से सम्बंधित लेखों का लाभ लीजिये। सादर

Comment by Harash Mahajan on March 25, 2018 at 4:46pm

आदरणीय समर जी आपके मार्गदर्शन के लिए तह ए दिल शुक्रिया ।

नए नुक्ते वाले काफिये लेकर जल्द आपकी निगरानी में हाज़िर होता हूँ सर । 

सादर ।

Comment by Samar kabeer on March 25, 2018 at 2:14pm

जनाब बृजेश जी ये ग़ज़ल आपको "बढ़िया" क्यों लगी? बताने का कष्ट करें ।

Comment by Samar kabeer on March 25, 2018 at 2:11pm

तीसरे शैर में 'इतराज़' क़ाफ़िया नहीं चलेगा,क्योंकि सही शब्द है "ऐतिराज़"इसी तरह 'मुहताज' और ' सरताज' क़वाफ़ी नहीं चलेंगे,क्यों कि इन के अंत में 'ज' है और आपके क़वाफ़ी "ज़" के चल रहे हैं।

'आवाज़' 'परवाज़' क़वाफ़ी ले सकते हैं ।पुनः प्रयास करें ।

Comment by Harash Mahajan on March 25, 2018 at 10:38am

आदरणीय नीलेश जी आदाब आपकी टिप्पणी में दिए सुझाव ओर नर्गदर्शन में कुछ सुधार किया है । कृपया ज़रा अपने कीमती वक़्त में से कुछ पल इधर दीजियेगा । 

सादर ।

...

दुश्मन भी अगर दोस्त हों तो नाज़ क्यूँ न हो,
महफ़िल भी हो ग़ज़लें भी हों फिर साज़ क्यूँ न हो ।

है प्यार अगर जुर्म मुहब्बत क्यूँ बनाई,
गर है खुदा तुझमें, वो हमराज़ क्यूँ न हो ।

पर्दे में छुपा रखता हूँ वो राज़-ए-मुहब्बत,
गर आबरू हो ज़ख्मी तो इतराज़ क्यूँ न हो ।

दुश्मन की कोई चोट न होतीं है गँवारा,
गर ज़ख्म देगा दोस्त तो नाराज़ क्यूँ न हो ।

संगीत की तरतीब में तालीम बहुत है,
फिर गीत ग़ज़ल, बहरों की, मुहताज़ क्यों न हो ।

झेला है अगर इश्क़-ए-समंदर में पसीना,
तो 'हर्ष' तू हालात का सरताज क्यूँ न हो ।

Comment by Harash Mahajan on March 25, 2018 at 10:32am

आ0 बृजेश जी उत्साहवर्धन जे लिए शुक्रिया ।

सादर ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"गजल*****करता है कौन दिल से भला दिल की बात अबबनती कहाँ है दिल की दवा दिल की बात अब।१।*इक दौर वो…"
4 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"सादर अभिवादन।"
4 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"स्वागतम"
9 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"  आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' जी सादर नमस्कार, रास्तो पर तीरगी...ये वही रास्ते हैं जिन…"
18 hours ago
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Feb 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 6
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Feb 5
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Feb 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service