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ग़ज़ल -- जो काम बस का नहीं, उसका इश्तिहार किया // दिनेश कुमार

1212----1122----1212----112/22

जो काम बस का नहीं, उसका इश्तिहार किया
यही तो काम सियासत ने बार बार किया

तमाम अहले-चमन भी सज़ा के भागी हैं
अगर उक़ाब ने गोरैया का शिकार किया

उन्हें तो शौक़ था वादों पे वादे करने का
और एक हम थे कि वादों पे ए'तिबार किया

ये कौन आया है साहिल से लौट कर प्यासा
ये किसकी प्यास ने दरिया को शर्मसार किया

मुक़ाम उनको ही हासिल हुआ है दुनिया में
जिन्होंने राह की दुश्वारियों को पार किया

जो इसके साथ न चल पाया रह गया पीछे
गुज़रते वक़्त ने कब किसका इन्तिज़ार किया

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by दिनेश कुमार on April 18, 2018 at 5:23pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ. श्याम नारायण जी। 

Comment by Samar kabeer on April 18, 2018 at 2:51pm

जनाब दिनेश कुमार जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by Shyam Narain Verma on April 18, 2018 at 1:37pm
बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।
Comment by दिनेश कुमार on April 18, 2018 at 11:22am

हौसला अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया आपका आ. नीलम जी। 

Comment by Neelam Upadhyaya on April 18, 2018 at 11:20am

"तमाम अहले-चमन भी सज़ा के भागी हैं अगर उक़ाब ने गोरैया का शिकार किया"

आदरणीय दिनेश कुमार जी, बहुत ही उम्दा गजल पर मुबारकबाद ।

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