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ग़ज़ल -- तृष्णाओं के भँवर में फँसा बद-हवास था // दिनेश कुमार

221 - - 2121 - - 1221 - - 212

तृष्णाओं के भँवर में फँसा बद-हवास था
सब कुछ था मेरे पास मगर मैं उदास था

जीवन के मयकदे में कुछ हालत थी यूँ मेरी
होंठों पे प्यास हाथ में खाली गिलास था

हर आदमी के ज़ेह्न में रक़्साँ थी बेकली
दुनियावी ख़्वाहिशात का हर कोई दास था

आह्वान बंद का था सियासत के नाम पर
होगा नहीं वबाल फ़क़त इक क़यास था

भगवे हरे में बँट गया फिर शह्रे-दुश्मनी
चारों तरफ़ इक आलमे-ख़ौफ़ो-हिरास था

तूफ़ाँ में रात जिसका सफ़ीना बचा नहीं
कहते हैं नाख़ुदा वो समन्दर-शनास था

मरकज़ था हर निगाह का महफ़िल में वो 'दिनेश'
हैरत नहीं जो उसका चमकता लिबास था

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 11, 2018 at 6:43pm

जनाब दिनेश कुमार साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2018 at 3:34pm

बहुत खूब...

Comment by Neelam Upadhyaya on April 10, 2018 at 11:33am

आदरणीय दिनेश जी, बहुत ही उम्दा । बधाई ।

Comment by Shyam Narain Verma on April 10, 2018 at 10:38am
क्या बात है .... बहुत उम्दा | बधाई आप को 
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 9, 2018 at 8:50pm

वाह क्या कहने आदरणीय दिनेश जी..बेहतरीन ग़ज़ल..

Comment by Ajay Tiwari on April 9, 2018 at 6:36pm

आदरणीय दिनेश जी,

तूफ़ाँ में रात जिसका सफ़ीना बचा नहीं
कहते हैं नाख़ुदा वो समन्दर-शनास था       बहुत खूब !

उम्दा ग़ज़ल हुई..हार्दिक बधाई.

Comment by दिनेश कुमार on April 9, 2018 at 6:24pm

शुक्रिया आ. बसंत जी। आभार।

Comment by दिनेश कुमार on April 9, 2018 at 6:22pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय निलेश सर जी, हौसला अफ़ज़ाई के लिए।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 9, 2018 at 1:30pm

हार्दिक बधाई आदरणीय दिनेश कुमार जी।बेहतरीन गज़ल।

आह्वान बंद का था सियासत के नाम पर
होगा नहीं वबाल फ़क़त इक क़यास था

भगवे हरे में बँट गया फिर शह्रे-दुश्मनी
चारों तरफ़ इक आलमे-ख़ौफ़ो-हिरास था

Comment by Samar kabeer on April 9, 2018 at 11:19am

जनाब दिनेश कुमार जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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