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प्रतीक (लघु रचना ) .....

प्रतीक (लघु रचना ) .....

मेरे होटों पे
तूने अपने स्पर्श से
जो मौन शब्द छोड़े थे
सोचा था
वो
ज़हन की गीली मिट्टी में गिरकर
अमर गंध बन जाएंगे
क्या पता था
वो स्पर्श
मात्र
भावनाओं की आंधी थे
जो अन्तःस्थल में
एक घुटन के
प्रतीक
बन कर रह गए
एक स्वप्न का
यथार्थ कह गए

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on July 1, 2018 at 4:12pm

आदरणीय   बृजेश कुमार 'ब्रज' जी सृजन आप की स्नेहिल प्रशंसा का दिल से आभारी है ।

Comment by Sushil Sarna on July 1, 2018 at 4:12pm

आदरणीय  Shyam Narain Verma जी सृजन आप की स्नेहिल प्रशंसा का दिल से आभारी है ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 30, 2018 at 1:43pm

खूबसूरत अहसास...बहुत ही खूब

Comment by Shyam Narain Verma on June 30, 2018 at 11:47am
इस खूबसूरत  रचना की हार्दिक बधाई

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