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अकेली ...

मैं
एक रात
सेज पर
एक से
दो हो गयी
जब
गहन तम में
कंवारी केंचुली
ब्याही हो गयी

छोटा सा लम्हा
हिना से
रंगीन हो गया
मेरी साँसों का
कंवारा रहना
संगीन हो गया

एक अस्तित्व
उदय हुआ
एक विलीन
हो गया
और कोई
मेरे अस्तित्व की
ज़मीन हो गया

अजनबी स्पर्शों की
मैं
सहेली हो गयी
एक जान
दो हुई
एक
अकेली हो गयी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 811

Comment

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Comment by Sushil Sarna on July 10, 2018 at 7:31pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज'  जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on July 10, 2018 at 7:31pm

आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'   जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on July 10, 2018 at 7:31pm

आदरणीय  Samar kabeer   जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on July 10, 2018 at 7:30pm

आदरणीय Tasdiq Ahmed Khan  जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on July 10, 2018 at 7:30pm

आदरणीय  Mohammed Arif जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का आभारी है।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 5, 2018 at 5:50pm

उम्दा रचना आदरणीय..भावपूर्ण

Comment by नाथ सोनांचली on July 5, 2018 at 3:43pm

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बढिया लिखा है आपने। इस प्रस्तुति पर मेरी अनन्त बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Samar kabeer on July 5, 2018 at 11:42am

जनब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 5, 2018 at 6:30am

हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी।लाज़वाब प्रस्तुति।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 4, 2018 at 8:27pm

जनाब सुशील सरना साहिब  , सुन्दर और जज़्बाती रचना हुई है मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं |

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