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अमानत (लघुकथा)

जमींदार रामलोचन की आर्थिक स्थिति उस स्तर पर पहुंच गई थी जहाँ कहा जाता है कि हाथी बिक गया जंजीर ढ़ो रहे हैं।
उधर गाँव के टेलर का लड़का हाथी खरीदने को आतुर था। तीनों पहर के भोजन की निश्चिंतता न थी, लेकिन बंगलौर के किसी फैशन संस्थान में नामांकन के लिए इंटरव्यू दे आया था । वहाँ फीस की रकम सुनकर ही समझ गया था ये रकम सीधे तरीके से वह हफ्ते भर में नहीं जुटा सकता ।
घर लौटने के रास्ते में उसने हर सीधे टेढ़े तरीके से सोचा तब उसे लगा जमींदार के घर में ही उसकी मंशा पूरी हो सकती है, वरना गाँव में और कौन है जिसके घर महीने भर का राशन हो।

रात्रि के दूसरे पहर में स्टेशन से उतर कर जाते हुए ही उसने जमींदार के घर में सेंध मार दी।
चोरी की खबर जब लगी तो जमींदार चिंतित हो गये ,घर में चोरी होने लायक तो कुछ न था और कुछ गायब भी नहीं हुआ" हे भगवान ! अब वह चोर गाँव में बात फैला देगा कि जमींदार कंगला है। "
तभी पत्नी ने सूचना दी बेटी ने सास से छुपाकर कुछ गहने और पैसे उसके पास रखे थे चोर वह सारा ले गये।
उन्होंने राहत की साँस ली, चलो इज्जत बची। प्रत्यक्षतः मुस्कुराये " कुछ भी कहो चोर था कलाकार, कितने कलात्मक ढंग से सेंध काटी है । " (मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by babitagupta on July 9, 2018 at 5:55am
  1. रस्सी जल गई, पर ऐठ नहीं गई, कहावत को चरितार्थ करती लघुकथा, झूठी शान में, फिर चाहे बेटी का माल ही क्यों ना चला गया हो, बेहतरीन रचना,बधाई स्वीकार कीजिएगा आदरणीय सर जी. 
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 7, 2018 at 1:27pm

आ. कुमार गौरव जी, नमस्कार । अच्छी कथा हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Neelam Upadhyaya on July 6, 2018 at 4:07pm

आदरणीय कुमार गौरव जी, नमस्कार।  अच्छी लघु कथा हुई है।  बधाई स्वीकार करें। 

Comment by Samar kabeer on July 6, 2018 at 12:00pm

जनाब कुमार गौरव जी आदाब,लघुकथा का अच्छा प्रयास हुआ है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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