For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

१२२२,१२२२,१२२२,१२२२ 

अता.........करदी

हमारेही मुक़द्दर में जुदाई क्यों अता करदी०
ज़रा इतना तो बतलाओ,कि ऐसी क्या खता करदी ।०

मेरी खामोशियोंको, नाम रुसवाई दिया तुमने०
कहाँ कुछ हम थे बोले, बात ऐसी, क्या, बता करदी । ०

कहाँ माँगी कहो जन्नत , ज़माने भर की दौलत भी०
मेरी तक़दीरसे, ख़ुशियाँ सभी क्यों लापता करदीं ।०

पढी बस इक ग़ज़ल हमने,कभी यारोंकी महेफिल में ०
तुम्हारा ज़िक्र क्या आया,खुदा या दासताँ करदी ।०

तुम्हारी राह पर आँखें बिछायें हम खड़े अबतक०
हमें ये देखना, आते हो तुम की या कता करदी ।।”०

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 758

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Kishorekant on August 1, 2018 at 6:50pm

आपके अमूल्य मार्गदर्शन के लिये मेरा धन्यवाद स्विकार करें ।आगेभ आपका सहयोग अपेक्षित !

सादर 

Comment by Samar kabeer on August 1, 2018 at 5:09pm

एक बात ये कि शब्द पूरा होने पर स्पेस दिया करें ,जैसे 'हमारेही'--"हमारे ही"-

'ख़ामोशियोंको'--"ख़ामोशियों को" वग़ैरह ।

Comment by Samar kabeer on August 1, 2018 at 2:57pm

जनाब किशोर एकांत जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

कुछ बातें आपके संज्ञान में लाना चाहूँगा ।

चूँकि ग़ज़ल के क़वाफ़ी मतला तय करता है,इसलिये पहले मतले पर ही बात करते हैं ।

आपने मतले में जो क़वाफ़ी लिए हैं 'अता' और 'ख़ता' आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि ये उर्दू में 'तोय' अक्षर के क़वाफ़ी हैं, जबकि आगे के अशआर में 'त' के क़वाफ़ी लिए गए हैं जो मतले की वजह से ग़लत हो रहे हैं,आपको चाहिए कि इस ग़ज़ल में 'आ'स्वरांत क़वाफ़ी लें,इसके लिए मतले के एक मिसरे में क़ाफ़िया बदलने से काम हो जायेगा,मतले का ऊला मिसरा यूँ कर लें:-

'हमारे ही मुक़द्दर में जुदाई क्यों सज़ा कर दी'

//मेरी तक़दीरसे, ख़ुशियाँ सभी क्यों लापता करदीं //

इस मिसरे में रदीफ़ बदल गई है,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'मेरी तक़दीर से हर इक ख़ुशी क्यों लापता कर दी'

// तुम्हारा ज़िक्र क्या आया,खुदा या दासताँ करदी//

इस मिसरे में क़ाफ़िया दोष है,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'तुम्हारा ज़िक्र क्या आया,क़यामत इक बपा कर दी'

//हमें ये देखना, आते हो तुम की या कता करदी //

इस मिसरे में भी क़ाफ़िया दोष है,इस मिसरे को बदलकर यूँ करना होगा:-

'मगर तुमने तो जानाँ भूलने की इन्तिहा कर दी'

बाक़ी शुभ शुभ ।

Comment by vijay nikore on August 1, 2018 at 2:29pm

//तुम्हारी राह पर आँखें बिछायें हम खड़े अबतक०
हमें ये देखना, आते हो तुम की या कता करदी ।।//

वाह ! 

आपकी गज़ल अच्छी लगी। हार्दिक बधाई,  किशोर कांत जी।

Comment by Kishorekant on July 31, 2018 at 9:40pm

आदरणीय अमरमणि जी, आपकी प्रेरणादायी टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद ।

गुणीजनों के मार्गदर्शन के लिये आतुर हूँ ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on July 31, 2018 at 9:34pm

आ0  किशोर कांत  साहब बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई । मझे हर शेर अच्छे लगे । बाकी गुण दोष ग़ज़ल के विद्वान् देझेंगे । मेरी ओर से हार्दिक बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 31, 2018 at 8:49pm

हार्दिक बधाई आदरणीय किशोर कांत जी।बेहतरीन गज़ल।

Comment by Kishorekant on July 31, 2018 at 5:49pm

आपका बहुत बहुत आभार श्री श्याम नारायण वर्मा जी ।

कृपा बनाये रक्खें, 

सादर ।

Comment by Kishorekant on July 31, 2018 at 5:16pm

आदरणीय  वसंतकुमार शर्माजी, ग़ज़ल पसंद करनेकी धन्यवाद ।दास्ताँ पर मैं भी दुविधामें हूँ।मुझे योग्य विकल्प नहीं मिला इसलिये धृष्टता की है ?

मंचसे मार्गदर्शन चाहूँगा ।

सादर ।

Comment by Shyam Narain Verma on July 31, 2018 at 5:16pm
बहुत ही सुन्दर ,  हार्दिक बधाई आपको ………….. सादर 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन।बहुत सुंदर समसामयिक गजल हुई है। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।"
1 hour ago
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

ग़ज़ल

   ग़ज़ल2122  2122  212 कितने काँटे कितने कंकर हो गयेहर  गली  जैसे  सुख़नवर हो गये रास्तों  पर …See More
2 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . क्रोध

दोहा पंचक. . . . क्रोधमानव हरदम क्रोध में, लेता है प्रतिशोध ।सही गलत का फिर उसे, कब रहता है बोध…See More
6 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . शृंगार
"आदरणीय जी भविष्य के लिए  स्पष्ट हुआ ।हार्दिक आभार आदरणीय जी "
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .दीपावली
"आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सृजन की समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । इंगित बिन्दुओं का भविष्य…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ * ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं…See More
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, इस गजल को अभी तनिक और समय दिया जाना था.  सादर  "
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .दीपावली
"आदरणीय सुशील सरना जी,  दीप जले हर द्वार पर, जग में हो उजियार ...       …"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी,  तीर्थ जाना  हो  गया है सैर जबभक्ति का यूँ भाव जाता तैर…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . शृंगार
"किसने कहा छंद स्वर आधारित 'ही' हैं। तब तो शब्दों के अशुद्ध उच्चारण करने वाले छांदसिक…"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . शृंगार
"आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । स्पर्शों में…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय विजय निकोर जी, एक अरसे बाद आपकी कोई रचना पढ़ रहा हूँ. एकान्त और अकेलापन के बीच के अन्तर को…"
Monday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service