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Kishorekant
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Kishorekant commented on Kishorekant's blog post ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश
"आदरणीय समर कबीरजी आपकी सुचनाओं का ध्यान रक्खूंगा । OBO पर इतने सौहार्द पूर्ण वातावरणमें उचित मार्गदर्शन मेरे अहोभाग्य का विषय है ! गुणी जनों का सहयोग मिलता रहा तो कुछ न कुछ सीख ही जाऊँगा ।  आभार !"
Aug 11
Kishorekant commented on Kishorekant's blog post ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश
"आदरणीय रविकान्त जी , आपके मार्गदर्शन का बहुत बहुत आभार ।आगके लिये ये सुचनायें काफ़ी सहायक होगी ।"
Aug 11
Ravi Shukla commented on Kishorekant's blog post ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश
"आदरणीय किशाेरकांत जी  आे बी आे पर गजल की बातें एवं गजलकी कक्षा से मूल भूत जानकारी लेकर आगे बढे बहर अौर काफिया गजल का मूल भूत तत्व है इसके  बिना गजल नहीं हो सकती । अब मेरे द्वारा उठाए गये दो शब्द खािलाफत को  विरोघ के अर्थ में नहीं…"
Aug 11
Kishorekant commented on Kishorekant's blog post मौन
"धन्यवाद आदरणीय महम्मद अरिफ साहब "
Aug 9
Kishorekant commented on Kishorekant's blog post मौन
"आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय समर कबीर जी ।कृपा बनाये रक्खें ।"
Aug 9
Samar kabeer commented on Kishorekant's blog post मौन
"जनाब किशोरकांत जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 9
Mohammed Arif commented on Kishorekant's blog post मौन
"आदरणीय किशोरकांत जी आदाब,                                     मौन रहकर भी बहुत कुछ कहा जा सकता है । मौन सबसे बड़ी शक्ति है । बेहतरीन अतुकांत कविता । हार्दिक…"
Aug 8
Kishorekant posted blog posts
Aug 7
Kishorekant left a comment for Samar kabeer
"आपका आभार आदरणीय समर कबीर जी । आप की सुचना के अनुसार अभ्यास शुरु कर दिया है । आशा है आगे भी आपका मार्गदर्शन मिलता रहेगा ।भूलों के लिये दरगुजर करें ।"
Aug 7
Samar kabeer commented on Kishorekant's blog post ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश
"जनाब किशोर कांत जी आदाब, अव्वल तो ये ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल नहीं है,दूसरी बात ये कि ये ग़ज़ल भी नहीं है,क्योंकि बिना रदीफ़ की ग़ज़ल हो सकती है,लेकिन बिना क़वाफ़ी की ग़ज़ल नहीं होती,और आपकी इस प्रस्तुति में रदीफ़ तो है, क़वाफ़ी नहीं है,अगर ग़ज़ल विधा पर क़लम चलाना है तो…"
Aug 7
Kishorekant commented on Kishorekant's blog post ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश
"तस्दिक अहमद खाए साहब हौसला अफ़्जाई का तहें दिलसे शुक्रिया । सीखने सीखाने के सिलसिलेमें आपका  सहयोग अवश्य दें ।"
Aug 7
Kishorekant commented on Kishorekant's blog post ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश
"आदरणीय रवि शुक्लाजी, 'फ'के ऊपर रेफ के कारण मैंने  सि को गुरु (२) किया है  सिर्फ़ = सिर फ सिर्फ़ मसला २  १  २ २ ख़िलाफ़त में ......के स्थान पर  ........भले चाहे  .....कर दिया है ? आपका आभार एवं…"
Aug 7
Kishorekant commented on Kishorekant's blog post ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश
"आदरणीय नविनमणी त्रिपाठी जी, आपका मार्गदर्शन मूल्यवान है । मतलेमें है और हैं (.) का भेद है । काफिया  निभाते नहीं बन पड़ा था इसलिये आजकल को क़ाफ़िया बनाकर   ग़ैर मुर्रदफ कहा ।क़ाफ़िये की खोजमें रचना का प्रस्तुत रूप ही  बदल जायेगा। ईसी…"
Aug 7
Ravi Shukla commented on Kishorekant's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय किशोर कांत जी,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । दूसरे आैर तीसरे शेर में यहाँ लफ्ज स्पषट हो जाए तो शेर आेर सुंदर हो जाएगा । सादर"
Aug 6
Ravi Shukla commented on Kishorekant's blog post ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश
"आदरणीय किशोर कांत जी प्रयास अच्छा हुआ है  मतले मे काफिया आैर रदीफ दोनो ही है  आैर पूरी गजल में आजकल रदीफ चल रहाहै इसलिए गैर मुरद्दफ नहीं हुई है गजल साथाही आपने अरकान भी नहीं लिखे है । लफ्ज  खिलाफत अर्थ में आैर मसला वज्न के…"
Aug 6
Naveen Mani Tripathi commented on Kishorekant's blog post ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश
"जनाब किशोर कान्त साहब बहुत सुंदर प्रयास है ग़ज़ल का ।ग़ज़ल गैर मुदर्र्फ कैसे हुई रदीफ़ तो आजकल है । "
Aug 6

Profile Information

Gender
Male
City State
Ahmedabad
Native Place
Ahmedabad
Profession
Retired
About me
Love writing poems, act in plays
फ़रियाद----------मुक़द्दर में हमारे तुमने,जुदाई क्यों अता करदीज़रा इतना तो बतलाओ,कि ऐसी क्या खता करदी ।मेरी मजबुरीयोंको,नाम रुसवाई का दिया तुमनेखाामोश ही थे, बात ऐसी, क्या, बता करदी ।कहाँ माँगी थी जन्नत , या ज़माने भर की दौलत भीमेरी तक़दीर से, ख़ुशियाँ सभी क्यों लापता करदी ।पढ़ा था क़ाफ़िया हमने,यूँ ही महेफील में यारों कीतुम्हारा ज़िक्र क्या आया,खुदा या दासताँ करदी ।खड़े चौराहे पर अबभी,कोई पैग़ाम आजायेहमें ये देखना, आते हो तुम कि या कता करली ।।

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मौन

मौन

मौन में शाश्वत सुख है, शब्द में आक्रन्द है

शब्द नहीं अनिवार्य होते दो दिलों की चाह में

सब समझ लेते हैं प्रेमी सिर्फ़ अपनी आह मे

मन से मन का मेल है तो नीरवता भी छंद है

मौन मेंशाश्वत..........

शब्द की तो एक सीमा,अविरत होता मौन है

शब्द के तो बाण होते मौन कितना सौम्य है

मौन में तो सहजता है, शब्द में पाखंड है

मौन में शाश्वत ...........

क्या कहुँ,कितना कहुँ,किसको कदुँ क्योंकर कहुँ

सच्चा कहुँ,मिथ्या कहुँ,मैं ये कहुँ या वो कहुँ…

Continue

Posted on August 7, 2018 at 6:12pm — 4 Comments

ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश

ये हवा कैसी चली है आजकल

सब यहाँ दिखते दुखी हैं आजकल

दुख किसीको है अकेला क्यों खड़ा

और किसीको भीड का ग़म आजकल

है शिकायत नौजवाँ को बाप से

बाप को लगता वो बिगड़ा आजकल

मायने हर चीज के बदले यहाँ

है नहीं अच्छा बुरा कुछ आजकल

बाँटकर खाने के दिन वो लद गये

लूटलो जितना सको बस आजकल

मुल्क के ख़ातिर गँवाते जान थे

क़त्ल करते मुल्कमें ही आजकल

क़ौल के ख़ातिर गँवायें जान…

Continue

Posted on August 5, 2018 at 9:30pm — 9 Comments

ग़ज़ल

1222,1222, 1222, 1222

चलो ये बोझ भी दिलपर उठाकर देख लेते हैं

किसीको हम ज़रा दिलमें बसाकर देख लेते हैं

जियेगें किस तरह तन्हाँ यहाँ साथी अगर छूटा

यहाँ जो बेवजह रूठा मनाकर देख लेते हैं .....

कहाँतक हार है अपनी ज़रा इसका पता करलें

यहाँ भी ईक नयी बाज़ी लगाकर देख लेते है....

कहो कैसे यक़ीं तुमको दिलायें आशनाई का.

लगेहैं जख्म जो दिल पर दिखाकर देख लेते हैं

जमींपर जो नहीं मिलते वो मिलते आसमानों पर

चलो…

Continue

Posted on August 4, 2018 at 5:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल

हमें ख़ुशियाँ नहीं क्यों ग़म मिला है
नहीं माँगा वही हरदम मिला है

अधूरी चाहतें लेकर जिये हैं
हमेशा चाहतोंसे कम मिला है

नहीं फ़रियाद बस सजदे किये हैं
कहो जन्नतमें’ क्यों मातम मिला है

सफ़र कांटोभरा क्या कम नहीं था
हमें बेज़ार क्यों मौसम मिला है

मनानेके सभी फ़न बेअसर हैं
बड़ा ही संगदिल हमदम मिला है


१२२२,१२२२,१२२ “अम” मिला है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Posted on August 2, 2018 at 7:12pm — 1 Comment

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At 11:21am on August 5, 2018, Usha Awasthi said…

आभार आपका

 
 
 

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