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जाना पहचाना अजनबी

मेरे चुटकी भर
मिलन को,,
उसका आकाश-भर
इंतेज़ार !
मेरे सौ झूठ...
उसका हज़ार ऐतबार !!
कुछ घबराता,
कुछ सकुचाता,
मेरे शहर से दूर..
मन के करीब आता ।
एक जाना पहचाना अजनबी,
हौले हौले ,
मेरे हृदय में
अपना घर बनाता है ।
जैसे टुकड़ा,
किसी बादल का ,,
बेजान दरख्तों में
जीवन भर जाता है!!
©Vrishty
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by V.M.''vrishty'' on October 13, 2018 at 11:35am
आदरणीय सुरेंद्र नाथ सिंह जी, सादर अभिवादन! आप पुनः पढ़ें , मूल भाव स्पष्ट है लगभग।
नायिका नायक को जानती नही,,फिर भी वो अजनबी अपना सा लगता है,,और धीरे धीरे प्रेम भाव का स्थायित्व हो रहा। यहाँ नायक किसी अन्य शहर का वासी बताया गया है।
Comment by V.M.''vrishty'' on October 13, 2018 at 11:32am
आदरणीय बृजेश कुमार जी, सादर अभिवादन! हृदय तल से धन्यवाद!
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on October 13, 2018 at 11:01am

आद0 वी एम वृष्टि जी सादर अभिवादन। अतुकांत के मूल भाव तक पहुँचने में मुझे थोड़ी परेशानी हुई। यह मेरी नासमझी भी हो सकती है। बहरहाल इस प्रस्तुति पर मेरी बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 13, 2018 at 7:36am

बढ़िया कविता हुई आदरणीया..बधाई

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