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"वो" और "मैं"...!!

((जब-जब 'खुद' को देखना चाहा... खुद को दो हिस्सों में बंटा पाया... कभी "वो" जो जीती ज़िन्दगी... तो कभी "मैं" जिसे जीती ज़िन्दगी... कुछ शब्द सिर्फ 'मेरे' बारे में... मेरी 'नज़र' में... मुझे जानने के लिये... मुझे समझने के लिये...))



वो सोचती बहुत...
मैं उसे रोक नहीं पाती...
वो नादाँ बहुत...
मैं उसे समझा नहीं पाती...
वो हंसती बहुत...
मैं मुस्कुरा भी नहीं पाती...

वो अनजान सबकी निगाहों से...
मैं जानती वो ये परख नहीं पाती...
वो समझती कि वो समझती है सबको...
मैं नासमझ कि मैं खुद को नासमझ हूँ पाती...
वो खुश कि वो नहीं जानती छल-कपट...
मैं नाखुश कि मैं ये छल से उसे वाकिफ करा नहीं पाती...
वो रखती बड़ा दिल हर किसी के लिये...
मैं बड़े दिल में भी खुद को समां नहीं पाती...

वो उभरती हर नए दिन के साथ...
मैं हर शाम के साथ गहरा नहीं पाती...
वो करती कोशिशें दिल ना तोड़ने की...
मैं टूटे दिलों को नज़रें उठा देख भी ना पाती...
वो मदमस्त अल्हड़ पवन की तरह...
मैं गंभीर, खुद को वक़्त-सा चलता पाती...
वो सजाती इन्द्रधनुष सपनों के आसमान में...
मैं बादलों से इन्द्रधनुष को छुपता पाती...

वो पसंद ना करती मुझे...
मैं उसे अपनी पसंदगी में ना पाती...
वो करती तकरार, रखती तर्क अपनें...
मैं चुप रहती, उसे नकार ना पाती...
वो तंग आ चुकी मुझसे पर साथ ना छोड़ती...
मैं भी मजबूर उस से जुदा हो ना पाती...
वो करती जब ढोंग मुझसे अनजान रहने का...
मैं भी तब उसकी नाराज़गी नज़रंदाज़ कर पाती...

वो बढ़ती रहती अपनें रास्ते...
मैं अपनें क़दम मंजिल को बढ़ता पाती...
वो चाहतें रखती बेशुमार...
मैं झूठी चाहतों को पनाह दे ना पाती...
वो अपनें अन्दर की "मैं" बन ना पाती...
मैं अपनें अन्दर की "वो" से खुद को दूर होता पाती...!!

:::::::: जुली मुलानी ::::::::
:::::::: Julie Mulani ::::::::

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Comment

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Comment by Julie on July 3, 2011 at 1:09am
शुक्रिया रवि जी... :-)
Comment by Rash Bihari Ravi on June 29, 2011 at 6:45pm
khubsurat lajabab
Comment by Julie on June 28, 2011 at 8:47pm
संगीता जी आभार... ... ... :-)
Comment by Julie on June 28, 2011 at 8:47pm
सौरभ जी आभार... आशीष बनाये रखें... :-)
Comment by Julie on June 28, 2011 at 8:46pm

वंदना जी बेहद शुक्रिया पसंद करने का... ... ... :-)

Comment by Julie on June 28, 2011 at 8:45pm
गणेश जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका हौंसलाअफज़ाई के लिए... ... ... :-)
Comment by sangeeta swarup on June 26, 2011 at 4:12pm
वो और मैं की कश्मकश को खूब उजागर किया है ...

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 26, 2011 at 1:55pm
प्रयोगधर्मिता के नये सोपान.. बधाई

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 24, 2011 at 9:07am
बहुत खूब जुली , अपने ही अक्स को केन्द्रित कर कविता कर आसान नहीं होता , किन्तु आप ने कर दिखाया है , खुबसूरत भावाभियक्ति , बहुत बहुत बधाई आपको !

कृपया ध्यान दे...

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