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मुझे विरासत में मिलीं
कुछ हथौड़ियाँ
कुछ छेनियाँ
मिला थोड़ा-सा धैर्य
कुछ साहस
थोड़ा-सा हुनर

मैं तराशने लगा
निर्जीव पत्थरों को

बना दिया
सुंदर-सुंदर मूर्तियाँ
जो कई अर्थों में
श्रेष्ठ हैं
ईश्वर द्वारा बनायी गयीं
सजीव मूर्तियों से
जिन्हें नहीं पता रिश्तों की मर्यादा
नही कर पातीं ये भेद
दूधमुँही बच्चियों, युवतियों और वृद्ध महिलाओं में

काश
एक अदद कलम
मुझे मिली होती
विरासत में

मैं होता
एक न्यायाधीश
लिखता निर्विघ्न फैसला
उन बलात्कारियों का
और तोड़ देता निब को

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 25, 2018 at 8:32am

आ. भाई गणेष जी, सादर अभिवादन । हम जैसों के मन की पीड़ा को बखूबी उकेरा है आपने । इसके लिए हार्दिक बधाई । काश! न्याय व्यवस्था में अधिकतर लोग इसी सोच के होते ...

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