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हाथ लगा जो गाल पर, पटकेंगे धर केश ।
दुनिया संग बदल रहा, गाँधी का ये देश।।

नैतिकता का पाठ अब, पढ़े-पढ़ाये कौन ?
मात-पिता-बच्चे सभी, ले मोबाइल मौन।।

'तुम' धन 'मैं' जब 'हम' हुए, दोनों हुए विशेष।
'हम' ऋण 'तुम' जैसे हुए, नहीं बचा अवशेष ।।

रीति जहां की देख कर, मन चंचल, मुख मौन।
मतलब के सधते सभी, पूछें तुम हो कौन ?

छप कर बिकता था कभी, जिंदा था आचार।
जबसे बिक छपने लगा, मृत लगते अखबार।।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by Ajay Tiwari on July 11, 2018 at 6:46am

आदरणीय गणेश जी,

दोहे बहुत अच्छे लगे. हार्दिक बधाई. 

'छप कर बिकता था कभी, जिंदा था आचार।
जबसे बिक छपने लगा, मृत लगते अखबार।।' 

इस दोहे में मेरे ख़याल से 'लगते' के अनुरूप 'बिकता था' को 'बिकते थे' और दूसरी पंक्ति में 'लगा' को 'लगे' करना उपयुक्त होगा.

सादर      

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 10, 2018 at 7:22pm
छप कर बिकता था कभी, जिंदा था आचार।
जबसे बिक छपने लगा, मृत लगते अखबार।।
उत्कृष्ट . नयी पत्रकारिता पर बेहतरीन तंज आदरणीय
Comment by babitagupta on July 7, 2018 at 6:09pm

जीवन जीने के पहलुओं को वयां करती बेहतरीन रचना, हार्दिक बधाई आदरणीय सर जी. 

Comment by TEJ VEER SINGH on July 6, 2018 at 8:01pm

हार्दिक बधाई आदरणीय गणेश जी बागी जी।लाज़वाब प्रस्तुति।

Comment by Neelam Upadhyaya on July 6, 2018 at 4:05pm

सभी दोहे एक  से बढ़कर एक हैं।  प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय  गणेश जी।   

Comment by Shyam Narain Verma on July 6, 2018 at 12:22pm

बेहद उम्दा ...बहुत बहुत बधाई आप को आदरणीय | सादर 

Comment by Samar kabeer on July 6, 2018 at 11:57am

जनाब गणेश जी "बाग़ी" साहिब आदाब,हालात-ए-हाज़िरा पर  बहुत उम्दा दोहे रचे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by अजय गुप्ता on July 6, 2018 at 11:32am

बहुत बढ़िया दोहे गणेश जी।

/तुम + मैं =हम

/हम - तुम =0

वाह। अद्भुत

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 6, 2018 at 11:01am

आद0 गणेश जी बागी जी सादर अभिवादन। एक से बढ़कर एक उम्दा दोहे। वर्तमान को आईना दिखाती,, 

रीति जहां की देख कर, मन चंचल, मुख मौन।
मतलब के सधते सभी, पूछें तुम हो कौन ? वाह वाह वाह, क्या कहने

 बहुत बहुत बधाई आपको।

Comment by Chetan Prakash on July 6, 2018 at 10:11am

 खूबसूरत दोहे, सामाजिक यथार्थ को रेखांकित करते हुए। कदाचित् भूलवश दूसरे दोहे का दूसरा तुकान्त फौन होना चाहिए, श्री जी !

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