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लघुकथा : धनवान (गणेश जी बाग़ी)

नर्स अनिता उदास होकर अपनी सहकर्मी से बोली, "आज का दिन ही खराब है, बेड नंबर चार को भी लड़की हुई है । याद है जो सुबह में बेटी पैदा हुई थी ?"
"कौन ! वही क्या, जो लोग बड़ी गाड़ी से आये थे"
"हाँ रि वही, बख्शीस माँगा, तो कुछ दिया भी नही और गुस्से से बोला कि एक तो बेटी हुई है और तुम्हे बख्शीस की पड़ी है"
खैर ....
"मालती देवी के घर से कौन है ?"
"जी बहन जी, मैं हूँ, बताइए न, मालती कैसी है और ...."
रघुआ घबराते हुए बोला ।
जी, आपके घर लक्ष्मी आयी है ।
रघुआ खुशी से झूम उठा और बारी बारी से कुर्ता के दोनों पाकिटों से कुछ मुड़े टूडे दस और बीस के नोट नर्स की हाथों पर रख दिया ।
अनिता को सहसा विश्वास ही नही हुआ ।
"लग रहा है आप सब पैसा बख्शीस में ही दे दिये, घर जाने के लिए रिक्शा-गाड़ी खर्च के लिए कुछ रखे हैं कि नही ?"
"कोई बात नही बहन जी, घर जाने के लिए मेरा अपना रिक्शा है न"
अनाथालय में पली-बढ़ी अनिता नम आँखों के साथ सोचने लगी, काश उसका भी बाप कोई रिक्शा वाला होता ।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by Mahendra Kumar on June 2, 2018 at 8:27pm

धनवान वो नहीं है जिसे पास अधिक धन है बल्कि वो है जिसके पास बड़ा दिल है. इस सार्थक सन्देश को देती उम्दा लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आदरणीय गणेश जी 'बाग़ी' जी. सादर.

Comment by Mohammed Arif on June 1, 2018 at 10:21am

आदरणीय गणेश 'बाग़ी' जी आदाब,

                          सच है , आज की तरक़्की के दौर में बहुत तेज़ चलकर भी बहुत पीछे हैं । हमारी सोच में पुरातन का वायरस घुसा हुआ है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें इस शानदार पेशकश पर ।

Comment by Shyam Narain Verma on May 30, 2018 at 3:41pm
इस अच्छी लघु कथा के लिए बधाई, आदरणीय सादर
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 29, 2018 at 10:05pm

कभी - कभी लगता है , हम अभी भी वहीं हैं , आगे बढ़ने और बढ़ लेने का तो मात्र दिखावा करते हैं।
बधाई , इस प्रभावशाली प्रस्तुति के लिए , आदरणीय गणेश जी, बागी जी , सादर।

Comment by babitagupta on May 29, 2018 at 2:11pm

बहुत ही भावपूर्ण रचना में पंक्ति उसका भी बाप.......प्रस्तुत रचना पर बधाई.

Comment by TEJ VEER SINGH on May 29, 2018 at 12:01pm

हार्दिक बधाई आदरणीय गणेश जी बागी जी।लाज़वाब लघुकथा।

Comment by TEJ VEER SINGH on May 29, 2018 at 12:00pm
हार्दिक बधाई आदरणीय गणेश जी बागी जी।लाज़वाब लघुकथा।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 29, 2018 at 7:23am

आदरणीत बागी सर  आपकी इस उत्कृष्ट रचना के लिए हार्दिक बधाई काश उसका भी बाप कोई रिक्शा वाला होता ।ये पंक्ति तो दिमाग ने घोइम रही है सादर 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 28, 2018 at 9:56pm

परिश्रमी धनवान दिल वाले की प्रतयुत्पन्नमतिमय असीम प्रसन्नता बाख़ूबी सम्प्रेषित हुई है!

इस नज़रिये से बढ़िया सटीक शीर्षक!

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 28, 2018 at 9:53pm

ज़मीनी हक़ीक़त बताती सामाजिक सरोकार पर केंद्रित बेहतरीन भावपूर्ण लघुकथा के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद और हार्दिक आभार आदरणीय श्री गणेश जी ' बागी' जी। पुरुष प्रधान समाज मेंं एक मिहनतकश  पिता की सकारात्मकता उभारती बेहतरीन रचना। सादर।

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