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मिट गए नक़्श सभी....संतोष

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन/फ़इलुन

मिट गये नक़्श सभी दिल के दिखाऊँ कैसे

एक भुला हुआ क़िस्सा मैं सुनाऊँ कैसे

जा चुका है जो सभी तोड़के रिश्ते मुझसे

सोचता हूँ उसे आवाज़ लगाऊँ कैसे

अहमियत दिल की यहाँ लोग  समझते ही नहीं

उनको इस बात का अहसास दिलाऊँ कैसे

तिश्नगी उसकी बुलाती है इशारों से मुझे

मैं समन्दर की भला प्यास बुझाऊँ कैसे

प्यार का कोई तलबगार नहीं दुनिया में

इस ख़ज़ाने को मैं 'संतोष' लुटाऊँ कैसे

#संतोष_खिरवड़कर

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by santosh khirwadkar on November 19, 2018 at 8:36pm

आ. लक्ष्मण जी ,आभार!!!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 19, 2018 at 1:16pm

आदरणीय संतोष जी, अच्छी गज़ल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by santosh khirwadkar on November 19, 2018 at 8:32am

आ. राज साहिब पुनः त्रुटि...”भूला” 

Comment by santosh khirwadkar on November 19, 2018 at 8:30am

शुक्रिया आ. विजय जी 

Comment by santosh khirwadkar on November 19, 2018 at 8:29am

शुक्रिया आ. अजय जी

Comment by santosh khirwadkar on November 19, 2018 at 8:28am

शुक्रिया आ राज साहब ...सहमत ..”भूली” होना चाहिए.. टंकण त्रुटि के के लिये सम्पूर्ण मंच से क्षमा!!!

Comment by santosh khirwadkar on November 19, 2018 at 8:27am

शुक्रिया आ. क़मर जौनपुरी साहब

Comment by santosh khirwadkar on November 19, 2018 at 8:26am

शुक्रिया आ. श्री समर साहब 

Comment by vijay nikore on November 19, 2018 at 3:43am

गज़ल अच्छी लगी। हार्दिक बधाई, आदरणीय संतोष जी

Comment by राज़ नवादवी on November 18, 2018 at 10:41am

मेरे ख्याल से- 

मिट गये नक़्श सभी दिल के दिखाऊँ कैसे

एक भुला हुआ क़िस्सा मैं सुनाऊँ कैसे

में भुला को भूला करना उचित होगा, बह्र भी तभी मुकम्मल होगी. सादर. 

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