For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

1212     1122     1212      22

क़ज़ा के वास्ते ये इंतिज़ाम किसका है ।
तेरे  दयार  में  जीना  हराम किसका  है ।।

उसे है ख़ास ज़रूरत  जरा पता करिए ।
बड़े  सलीके  से  आया  सलाम किसका  है ।।

दिखे हैं रिन्द बहुत तिश्नगी के साथ वहाँ ।
कोई बताए गली में मुकाम किसका है ।।

है जीतना तो ख़यालात ऐब पर ले जा ।
खबर तो कर वो अभी तक गुलाम किसका है ।।

वो पूछ बैठे हमीं से यूँ अजनबी बनकर ।
के उनके हुस्न  पे  लिक्खा कलाम किसका है ।।

यही सवाल है साकी से आज महफ़िल में ।
छलक गया जो सरे बज़्म जाम किसका है ।।

फ़ना हुए जो वतन पर वो नाम भूल गए ।
तुम्हारे मुल्क़ में अब एहतराम किसका है ।।

ग़रीब आज भी भूखा मिला है फिर मुझको ।
यहां  फ़िज़ूल  का ये  ताम-झाम किसका  है ।।

-नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

Views: 340

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 24, 2019 at 6:00am

आ. भाई नवीन जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on January 23, 2019 at 11:32am

आ0 कबीर सर सादर नमन और आभार । उसे है खास ज़रूरत .......भाव कुछ इस तरह लिया है मैंने 

बात सलाम करने के लहजे पर है ।  ज़रूरत पर लोगों के सलाम करने का अंदाज़ बदल जाता है । 

है जीतना तो खयालात .......

पूरे शेर का मफ़हूम कुछ इस प्रकार है 

किसी पर जीत हासिल करनी है तो सबसे पहले उसकी कमियों पर ध्यान केंद्रित करो । अगर पता चल जाये कि अमुक व्यक्ति में ऐब कहाँ कहाँ पर है या वह किस नशे का गुलाम है तो उसे हराना आसान होगा । बस इतना सा सन्देश है सर । 

अदू का अर्थ नहीं समझ पाया । 

बेहतरीन इस्लाह के लिए हार्दिक आभार। आपकी बात महत्वपूर्ण है मैं शेर बदल दूंगा । 

सादर

Comment by Samar kabeer on January 22, 2019 at 10:58pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'उसे है ख़ास ज़रूरत  जरा पता करिए ।
बड़े  सलीके  से  आया  सलाम किसका  है'

उसे ख़ास ज़रूरत क्यों है? शैर का मफ़हूम स्पष्ट नहीं है,ऊला मिसरा यूँ कर लें:-

'ख़ुशी अदू को बहुत है,ज़रा पता कीजै'

'है जीतना तो ख़यालात ऐब पर ले जा ।
खबर तो कर वो अभी तक गुलाम किसका है'

इस शैर का भाव स्पष्ट नहीं,ख़ारिज करना उचित होगा ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
yesterday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 6
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Feb 5
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Feb 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Feb 5
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 4
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Feb 4

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Feb 4

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service