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एक ग़ज़ल (हिलता है तो लगता ज़िंदा है साया)

हिलता है तो लगता ज़िंदा है साया

लेकिन चुप है, शायद गूँगा है साया

कहने में तो है अच्छा हमराही पर

सिर्फ़ उजालों में सँग होता है साया

सूरज सर पर हो तो बिछता पाँवों में

आड़ में मेरी धूप से बचता है साया

असमंजस में हूँ मैं तुमसे ये सुनकर

अँधियारे में तुमने देखा है साया

वो पौधा महफूज़ रहे पर फले नहीं

जिस ऊपर बरगद का रहता है साया

मेरे सिवा ये सबके गले से लगता है
कैसे मानूँ मेरा अपना है साया

गाँव में साये खुल्ले-खुल्ले रहते हैं
शहर में तो साये पर गिरता है साया

बड़े नसीबों वाले हैं वो लोग 'अजेय

जिनके सर पर मात-पिता का है साया

#मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2019 at 4:48am

आ. भाई अजय जी ,अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by अजय गुप्ता on February 7, 2019 at 5:32pm

शुक्रिया समर साहब।

Comment by Samar kabeer on February 7, 2019 at 3:46pm

जनाब अजय गुप्ता जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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