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ग़ज़ल (छिपा बैठा चितेरा है)

दिखे हरसूँ अँधेरा है

कहाँ जाने सवेरा है

 

नहीं दिखता कहीं रस्ता

कुहासा है घनेरा है

 

हुनर सीखें नए कैसे

गुरु बिन आज चेरा है

 

चुराता जा रहा साँसें

समय है या लुटेरा है

 

बनाता है जो इंसा को

ये जीवन वो ठठेरा है

 

नहीं शिकवा है साँपों से

डसे जाता सपेरा है

 

नहीं घर रास है मुझको

दिलों में ही बसेरा है

 

तेरा क्या और क्या मेरा

चले माया का फेरा है

 

भरे हैं रंग दुनिया में

छिपा बैठा चितेरा है

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Comment

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Comment by PHOOL SINGH on December 13, 2018 at 4:53pm

सुंदर गजल,  हार्दिक बधाई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2018 at 4:51pm

आ. भाई अजय जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई । बाकी त्रुटियों के विषय में आ. समर जी बता ही चुके हैं । शेष शुभ शुभ...

Comment by अजय गुप्ता on December 12, 2018 at 2:41pm

उपरोक्त रचना #मौलिक है। अप्रकाशित नहीं। मेरी पुस्तक रंगोली में प्रकाशित हो चुकी है। ब्लॉग के लिए भी इस शर्त का मुझे पता नहीं था तो ऐसे भूलवश डाल दी। आगे से ध्यान रहेगा। इस रचना को यदि प्रबंधन चाहे तो हटा सकता है।

सादर

Comment by TEJ VEER SINGH on December 12, 2018 at 11:01am

हार्दिक बधाई आदरणीय अजय गुप्ताजी।बेहतरीन गज़ल ।

नहीं शिकवा है साँपों से

डसे जाता सपेरा है

Comment by Samar kabeer on December 11, 2018 at 10:36pm

जनाब अजय गुप्ता जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

सबसे पहली बात ये कि आपने मंच के नियमानुसार मौलिक व अप्रकाशित नहीं लिखा है ।

दिखे हरसूँ अँधेरा है'

इस मिसरे में 'हरसूँ' को "हरसू" कर लें ।

' कुहासा है घनेरा है'

इस मिसरे को यूँ कर लें:-

"कुहासा भी घनेरा है'

' नहीं घर रास है मुझको'

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है,यूँ कर लें:-

''नहीं है रास घर मुझको"

कृपया ध्यान दे...

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