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सुन! जो उनसे हो मुलाकात जाये तो क्या होगा

बह्र-
2122-2122-1221-222

सुन! जो उनसे हो मुलाकात जाये तो क्या होगा ।।
दरमियाँ फिर हो वही बात जाये तो क्या होगा।।

पर कहीं वो रूठ कर नजरें अपनी घुमा ली तो ।
बेबजह यूँ इश्क जजबात जाये तो क्या होगा।।

छोड़ उसको फिर न ये दर्द उलफत का देना अब।
रो के गर उसकी भी ये रात जाये तो क्या होगा।।

जानते हो ,वो यूँ मीलों सफर के जैसा है।
दो कदम चल के मुलाकात जाये तो क्या होगा ।।

मुझसे वो अच्छे से मिलना नहीं चाहती होगी।
बेवफा हूँ, मिल भी खैरात जाये तो क्या होगा ।।

आमोद बिन्दौरी / मौलिक- अप्रकाशित

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Comment by amod shrivastav (bindouri) on February 10, 2019 at 11:14am

आ रक्षिता दी ...उत्साहवर्धन के लिए आभार ...दी जो आप ने इंगित किया वो सही है । पर मैंने इस रचना में अपनी बात बोलचाल में कहने का प्रयास किया है । बह्र में ये कह पाना नए होने की दृस्टि से मेरे लिए बहुत कठिन था ।  इसमें मैं किसी अपने से अपने जज्बात कह रहा हूँ जिसमे आदर शामिल नहीं है । 

Comment by amod shrivastav (bindouri) on February 10, 2019 at 11:10am

आ समर दादा प्रणाम ...

दादा मार्गदर्शन के लिए आभार, शिल्प का आसाय मैं समझ नही पा रहा हूँ ।  क्या आप का कहन को लेकर प्रश्न है । रही व्याकरण की बात तो वो तो बिलकुल नहीं आती है। मैं ध्यान दे रहा हूँ जैसे ही मुझे समझ आएगा मैं त्रुटियां सही करने का प्रयास करूँगा। 

Comment by Samar kabeer on February 8, 2019 at 3:34pm

जनाब आमोद बिंदौरी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास बह्र के हिसाब से अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

शिल्प और व्याकरण पर और अभ्यास करें ।

Comment by रक्षिता सिंह on February 8, 2019 at 10:45am

आदरणीय अमोद जी ,नमस्कार !

बहुत सुंदर भाव, बधाई हो।

"जाये तो क्या होगा"  के स्थान पर यदि रदीफ़  "हो जाये तो क्या होगाा"  ज्यादा उचित रहेेेेगा ।

कुछ अन्य बदलाव भी जो मुझे आवश्यक लगे, कृपया गौर फरमाइये ।

        सुन! उनसे जो मुलाकात हो जाये तो क्या होगा ।।
        दरमियाँ फिर से वही बात हो जाये तो क्या होगा।।

कृपया ध्यान दे...

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