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वही उग आऊंगा मैं भी , अनाजों की तरह ..

बह्र 
1222-1222-1222-12

चलो हमदर्द बन जाओ, ख़यालों की तरह।।
कोई खुश्बू ही बिखराओ गुलाबों की तरह।।

बहुत थक सा गया हूँ जिंदगी से खेल कर।
कजा आगोश में भर लो दुशालों की तरह।।

मुझे बंजर में नफरत से कहीं भी फेंक दो।
वही उग आऊंगा मैं भी, अनाजों की तरहा।।

मुझे पढ़ना अगर चाहो तो पढ़ लेना यूँ ही ।
हुँ यू के जी के बस्ते में, किताबों की तरह।।

मेरी तुलना न कर उल्फ़त, गुलों की बस्ती' से।
मैं काफिर मैकदे में हूँ इन्हीं प्यालों की तरह।।

बहुत बेचैन मैं अहसास के हूँ दरमियाँ।
मुझे रौशन करो फिर से चरागों की तरह।।

मैं खुश्बू इश्क फ़ैलाने में माहिर हूँ अगर।
कहीं शामिल अगर कर दो नमाजों की तरह।
आमोद बिन्दौरी/ मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on January 21, 2019 at 10:49pm

जनाब आमोद बिंदौरी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

इस ग़ज़ल पर भी वही कहूँगा जो पिछली ग़ज़ल पर कहा था,कि बह्र पर आप क़ाबू पा चुके हैं लेकिन शिल्प और व्याकरण पर अभी अभ्यास की ज़रूरत है,और वो अध्यन से आएगा,और अध्यन आप करते नहीं ।

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