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छंद सोरठा .......

अपनेपन की गंध, अपनों में मिलती नहीं।
स्वार्थपूर्ण दुर्गन्ध,रिश्तों से उठने लगी।1।

प्रथम सुवासित भोर, प्रीत सुवासित कर गई।
मधुर मिलन का शोर, नैनों में होने लगा।2।

तृषित रहा शृंगार, बंजारी सी प्यास का।
धधक उठे अंगार,अवगुंठन में प्रीत के।3।

जागे मन में प्रीत, नैन मिलें जब नैन से ।
बने हार भी जीत, दो पल में सदियाँ मिटें।4।

वो पहली मनुहार, यौवन की दहलीज पर।
शरमीली सी हार,हर बंधन की हो गई।5।

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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