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फ़ऊलुन फ़ाइलातुन 1 2 2 2 1 2 2

मुहब्बत हो गई तो ?
क़यामत हो गई तो ?
सनम तू पास मत आ,
मुसीबत हो गई तो ?
कहानी पढ़ रहा हूँ ,
हक़ीक़त हो गई तो ?
मुझे तुम फ़ोन करना,
इबादत हो गई तो ।
सिपाही मैं अकेला ,
बग़ावत हो गई तो ?
खुदा तेरे जहाँ से ,
शिकायत हो गई तो?
- शेख़ ज़ुबैर अहमद मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Rakshita Singh on June 22, 2019 at 11:26pm

आदरणीय शेख़ जी, 

बहुत ही बेहतरीन रचना बहुत बहुत मुबारकबाद ।

Comment by Shaikh Zubair on June 12, 2019 at 3:32pm
मोहतरम समर कबीर साहब,आदाब
बहुत बहुत शुक्रिया आपका
मुझे तुम फ़ोन करना
इबादत हो गई तो।
इस शेर में ये कहने की कोशिश की है के,
तुम्हारी इबादत होने के बाद मुझे फ़ोन करना,
इबादत को पहल दी गई है बेशक इबादत सब से पहले है।
लेकिन आपकी राय सर आँखों पर, बदलने की कोशिश करूंगा।
Comment by Samar kabeer on June 12, 2019 at 11:27am

जनाब शैख़ ज़ुबैर अहमद साहिब आदाब,ओबीओ मंच पर आपका स्वागत है ।

ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'मुझे तुम फ़ोन करना,
इबादत हो गई तो'

इस शैर का मफ़हूम (भाव)स्पष्ट नहीं है,देखियेगा ।

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