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बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (ग़ज़ल)

ग़ज़ल (वो जब भी मिली)

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (12112*2)

वो जब भी मिली, महकती मिली,
गुलाब सी वो, खिली सी मिली।

हो गगरी कोई, शराब की ज्यों,
वो वैसी मुझे, छलकती मिली।

दिखाई पड़ीं, वे जब भी मुझे,
उन_आँखों में बस, खुमारी मिली।

लगाने की दिल, ये कैसी सज़ा,
वफ़ा की जगह, जफ़ा ही मिली।

कभी वो मुझे,बताए ज़रा,

जो मुझ में उसे, ख़राबी मिली।

गिला भी किया, ज़रा भी अगर,
पुरानी मगर, सफाई मिली।

'नमन' तो चला, भलाई की राह,
उसे तो सदा, बुराई मिली।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on July 20, 2019 at 6:51pm

//मिली थी ख़ता, हुई जो ख़फ़ा,
बताई न क्या, खराबी मिली"

मेरे ख़याल में इस शैर को यूँ कर सकते हैं:-

'कभी वो मुझे,बताए ज़रा

जो मुझ में उसे,ख़राबी मिली'

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on July 20, 2019 at 12:53pm

आदरणीय समर साहिब बहुत आभार। क्या उस शेर की जगह यह ठीक रहेगा।

मिली थी ख़ता, हुई जो ख़फ़ा,
बताई न क्या, खराबी मिली।

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on July 20, 2019 at 12:11pm

आदरणीय अजय तिवारी जी बहुत आभार।

Comment by Samar kabeer on July 20, 2019 at 12:01pm

जनाब बासुदेव जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करे ।

जनाब अजय जी की बात का संज्ञान लें ।

Comment by Ajay Tiwari on July 20, 2019 at 10:19am

आदरणीय बासुदेव जी, 

'हुई क्यों ख़फ़ा, पता न चला,'  'क्यों' और 'क्या' कभी गिराए नहीं जाते.

एक अच्छी कोशिश के लिए हार्दिक बधाई. 

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