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'देखो हिंदौस्तान फूँकता है'

2122 1212 112/22

जिस्म में पहले जान फूँकता है

बाद-अज़-जाँ अज़ान फूँकता है

सब्र कर शब गुज़र ही जाएगी

क्यों ये अपना मकान फूँकता है

अपनी नफ़रत की आग से कोई

देखो हिंदौस्तान फूँकता है

पास आकर वो गर्म साँसों से

मेरे दिल का जहान फूँकता है

आग तो सर्द हो चुकी कब की

क्यों अबस राखदान फूँकता है

हुक्म से रब के ल'अल मरयम का

देखो मुर्दे में जान फूँकता है

रोज़ आयात पढ़ के क़ुरआँ की

मुझ प इक मह्रबान फूँकता है

"समर कबीर"

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on October 29, 2019 at 2:25pm

मुहतरमा अमिता तिवारी जी आदाब, ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on October 29, 2019 at 2:24pm

जनाब अनीस शैख़ जी आदाब, ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ 

Comment by Samar kabeer on October 29, 2019 at 2:22pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on October 29, 2019 at 2:21pm

जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब, ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on October 29, 2019 at 2:19pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on October 29, 2019 at 2:18pm

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on October 29, 2019 at 2:17pm

जनाब नाहक़ जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on October 29, 2019 at 2:16pm

जनाब सी.एम. उपाध्याय जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on October 29, 2019 at 2:14pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by amita tiwari on August 17, 2019 at 2:01am

अपनी नफ़रत की आग से कोई

देखो हिंदौस्तान फूँकता है

जनाब कबीर  साब ,

इस  में वो सब कह दिया आपने जिसे लिखने में कितने पन्ने लग जाएँ तो भी न लिखा जाए 

बहुत बहुत  मुबारक 

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