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ले बाहों में सोऊँगी ....

ले बाहों में सोऊँगी ....

सावन की बरसात को
प्रथम मिलन की रात को
धड़कते हुए जज़्बात को
संवादों के अनुवाद को
ले बाहों में सोऊँगी
अस्तित्व अपना खोऊँगी

अपनी प्रेम कहानी को
भीगी हुई जवानी को
बारिश की रवानी को
नैन तृषा दिवानी को
ले बाहों में सोऊँगी
अस्तित्व अपना खोऊँगी

उस नशीली रात को
उल्फ़त की बरसात को
अजनबी मुलाक़ात को
हाथों में थामे हाथ को
ले बाहों में सोऊँगी
अस्तित्व अपना खोऊँगी

भीगे पलों की बात को
अधरों की सौगात को
नशे में बहकी रात को
तन छूती बरसात को
ले बाहों में सोऊँगी
अस्तित्व अपना खोऊँगी

हवा में उड़ते छातों को
सपनों की बरसातों को
आहट वाली रातों को
भुजबंध वाली बातों को
ले बाहों में सोऊँगी
अस्तित्व अपना खोऊँगी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 513

Comment

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Comment by Sushil Sarna on August 8, 2019 at 7:51pm

आदरणीय  C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi"जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया का दिल से आभार। 

Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 6, 2019 at 8:24pm

 Sushil Sarna जी,
सुन्दर रचना | 

Comment by Sushil Sarna on August 5, 2019 at 7:32pm

आदरणीय  Samar kabeer  जी सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा से सृजन उपकृत हुआ , हार्दिक आभार। 

Comment by Samar kabeer on August 4, 2019 at 11:03am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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