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‘छी: कितने गंदे, कुत्सित और बदबूदार हो तुम I तुम्हें देखकर घिन आती है I’ नदी ने मुंह बनाते हुए नाले से कहा I

‘बुरा न मानना दीदी आजकल तुम्हारी दशा भी मुझसे अच्छी नहीं है I’ नाले ने मुस्कराते हए जवाब दिया I

(मौलिक ?अप्रकाशित )

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 17, 2019 at 11:34am

आ० विनय जी , सादर आभार 

Comment by विनय कुमार on August 16, 2019 at 3:42pm

वाह, न्यूनतम शब्दों में अधिकतम कहती रचना, बहुत बहुत बधाई आपको आ डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव साहब

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 16, 2019 at 1:53pm

आ० समर कबीर साहब , धन्यवाद सर I 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 16, 2019 at 1:52pm

अग्रज निकोर जी , आशर्वाद हेतु आभारी हूँ I  सादर I 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 16, 2019 at 1:50pm

आओ तेजवीर सिंह साहब , अनुग्रहीत हुआ I 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 16, 2019 at 1:49pm

आ० सुशील सरना जी , सादर आभार I 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 16, 2019 at 1:49pm

आ० शेख  शहजाद उस्मानी साहब , बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 16, 2019 at 1:48pm

आ० विजय सर, आभार 

Comment by Samar kabeer on August 16, 2019 at 11:34am

जनाब डॉ. गोपाल नारायण जी आदाब,बहुत उम्द: लघुकथा लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by vijay nikore on August 14, 2019 at 1:33pm

 इतने कम शब्दों में  कमाल की लघुकथा लिखी है। हार्दिक बधाई, आदरणीय गोपाल नारायन जी।

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