पूर्तिहीन संवाद
आकुलित असंवेदित भाव
अपाहिज हुई वह जो होती थी
स्नेह की अपेक्षित शाम
गई कहाँ वह ममतामयी प्रतीक्षातुर बाहें
दिशायों से आती तुम्हारे आने की आहट
ऊब गई है, उकता गई है कब से
नपुंसक दुखजनित अजनबी हुई आस्था
महिमामयी स्मृतियों के आस-पास
मटमैली रौशनी सुनसान गहरी उदास
फिर क्यूँ जोड़ती हैं हमें देहहीन परछाइयाँ
आसाधारण अपूर्ण प्रवाही दिशाहीन हवा-सी
कसकती बदनसीबी
भटकते तैरते-मिलते-टूटते बुलबुले
बेथाह डबडबाई सम्भावनाएँ
फिर भी क्यूँ और कैसे कुहुकती है
कोई छलती उमीद ....
शायद इसीलिए कि कई बार कहा था तुमने
तुम कभी बदलोगी नहीं
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-- विजय निकोर
(मौलिक व अप्रकाशित)
Comment
रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई समर कबीर जी।
प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब,हमेशा की तरह सुंदर और उम्द: रचना,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
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