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जलेबी - लघुकथा -

आज स्कूल की छुट्टी थी इसलिये गुल्लू बिस्तर से उठते ही सीधा दादा दादी के कमरे की तरफ दौड़ पड़ा। कमरा खाली मिला तो माँ के पास जा पहुंचा,"माँ, दादा जी और दादी जी कहाँ चले गये?"

"यहीं पड़ोस वाले मंदिर तक गये हैं। अभी आने वाले हैं।"

"पर वे लोग रोज तो नहीं जाते मंदिर। आज कोई त्योहार है क्या?"

"आज उनकी शादी की पचासवीं साल गिरह है। इसलिये भगवान जी के दर्शन करने गये हैं।"

"अरे वाह, फिर तो आज विशेष पकवान बनेंगे।"

"हाँ जरूर बनेंगे।"

"माँ जलेबी भी बनाना।"

"अच्छा।"

"माँ मैं दादाजी और दादीजी को लेकर आता हूँ।"

और माँ के प्रति उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही बाहर दौड़ गया।

गुल्लू दादा दादी के साथ लौटा तो रसोई घर से पकवानों की महक आ रही थी।

थोड़ी देर में सबकी थालियाँ डाइनिंग टेबल पर लग गयीं।

गुल्लू थाली में पूड़ी कचोड़ी के साथ देशी घी की माँ के हाथ की बनी जलेबियाँ देख कर उछल पड़ा।जलेबी उसका मन पसंद पकवान था।जलेबी और वह भी देशी घी की।गुल्लू के मुँह में पानी आ गया।

तभी उसकी नजर दादाजी और दादीजी की थाली पर पड़ी।उसमें सादा खाना परोसा गया था।ना तो पूड़ी कचोड़ी थी और ना ही जलेबियाँ। गुल्लू उदास हो गया|

"माँ दादाजी और दादी जी को पूड़ी कचोड़ी और जलेबी क्यों नहीं दी?"

"उनको यह सब खाना मना है।"

"ठीक है माँ, आज मैं भी वही खाऊंगा जो दादाजी और दादीजी खायेंगे।" और थाली एक तरफ खिसका दी।

मौलिक एवम अप्रकाशित

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