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हिन्दी में हम पढ़े लिखेंगे, हिन्दी ही हम बोलेंगे।
हिन्दी को घर-घर पँहुचाकर, हिन्द द्वार हम खोलेंगे।
सकल हिन्द के हित में हिन्दी,सबको यह बतलायेंगे
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण, हिन्दी को फैलायेंगे।।
शर्मसार अपनी हिन्दी को, कभी नहीं होने देंगे।
हिन्दी है सम्भार हिन्द की, इसे नहीं खोने देंगे।
भ्रांत मनुज के गहन तिमिर को,दूर भगाएगी हिन्दी।
कटु विषाद मन जनित व्याधि को,सदा मिटाएगी हिन्दी।।
हिन्दी बिना हिन्द की महिमा,कभी नहीं बढ़ पाएगी।
अगर अनादृत हिन्दी होगी, मातृभूमि मिट जाएगी।
दृढ़ संकल्प सौंह ले मन में,हक अधिकार दिलाएंगे।
हिमगिरि के उत्तुंग भाल पर, हिन्दी को चमकाएंगे।।
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 21, 2019 at 12:24pm

बहुत उत्तम रचना वाह..

Comment by Samar kabeer on September 20, 2019 at 10:42am

"दृढ़ संकल्प सौंह ले मन में,हम अधिकार दिलाएंगे"

उचित लगे तो यूँ कर लें ।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on September 19, 2019 at 8:12pm

परमादरणीय गुरुदेव सादर अभिवादन आपके अनमोल उत्साह वर्धन से मन आह्लादित हुआ आपका दिल से आभार,इस जानबूझकर की गई गलती को सुधार नहीं पाया उपयुक्त शब्द ही नहीं मिल पाया सुरेन्द्र जी भी याद दिलाये अब पूरी पँक्ति बदल देंगे आपके सुझाव मेरे लिए तोहफे से कम नहीं दिली से नमन

Comment by Samar kabeer on September 19, 2019 at 2:24pm

जनाब डॉ. छोटेलाल सिंह जी आदाब, हिन्दी दिवस पर अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

'दृढ़ संकल्प सौंह ले मन में,हक अधिकार दिलाएंगे।'

इस पंक्ति में 'हक़' और 'अधिकार' एक ही है तो है?

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