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गंगा जमुना  भारती ,सर्व  गुणों की खान
मैला करते नीर को  ,यह पापी इंसान .

सिमट रही गंगा नदी ,अस्तित्व का सवाल
कूड़े करकट से हुआ ,जल जीवन बेहाल .

गंगा को पावन करे  , प्रथम यही अभियान
जीवन जल निर्मल बहे ,सदा करे  सम्मान .
--- शशि पुरवार

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Comment by shashi purwar on April 4, 2013 at 12:58pm

saurabh ji tahe dil se abhaar aapka , aapka yah margdarshan , aage badhne me sahayak hoga , dhyan rakhoongi . abhaar


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 1, 2013 at 3:13pm

आदरणीया शशि पुरवारजी, आपकी प्रथम प्रविष्टि ही आपकी रचनाओं के प्रति उत्सुकता जगा गयी है.  कथ्य सुन्दर है, मात्रिकता भी यथोचित है,  किन्तु शब्द-संयोजन का सही निर्वहन होना बाकी है. यह सब सहज और सरल है. बस सतत रहें.

इस सीखने-सिखाने के अभिनव मंच पर आपका सादर स्वागत है, आदरणीया.

एक बात :
मैला करते नीर को  ,यह पापी इंसान ...  .   पापी इन्सान के साथ यह  न कर ये कर दें, भाषागत दोष सध जायेगा.
सिमट रही गंगा नदी ,अस्तित्व का सवाल ..     है अस्तित्व सवाल
गंगा को पावन करे  में  पावन करें करना उचित होगा.   इसी तरह  सदा करे की जगह सदा करें करना उचित होगा.

Comment by shashi purwar on April 1, 2013 at 2:40pm

abhaar prachi ji protsaahit karti hui pratikriya hetu .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 22, 2013 at 3:38pm

प्रिय शशि जी सुन्दर व सार्थक दोहा प्रयास पर हार्दिक बधाई स्वीकारिये 

लिखते लिखते छंद रचनाएँ स्वतः ही सधने लगती हैं, आपने शिल्प का निर्वहन बिलकुल सही प्रकार से किया है, बस कथ्य को थोडा और कसना है और गेयता का ध्यान रखना है..

इस सुन्दर प्रयास के लिए ह्रदय तल से बधाई.

शुभकामनाएँ 

Comment by राजेश 'मृदु' on March 21, 2013 at 5:23pm

हम आपकी रचना का इंतजार करेंगें, सादर

Comment by shashi purwar on March 21, 2013 at 5:04pm

rajesh ji dhanyavad , aapne sahi kaha meri kalam is vidha me sahajta ka anubhav nahi karti hai , par naye prayog karne chahiye isiliye ek prayas tha , purane mitro ko dekh thodi sahajta jaroor hui , aapne kaha hai to ek baar apni kalam ki rachna post karoongi yadi yahan ke niyam honge to .... sadar abhaar

Comment by राजेश 'मृदु' on March 21, 2013 at 4:39pm

इस मंच पर पहली बार आपकी रचना से मुखातिब हूं, दोहे अच्‍छे लगे किंतु मुझे लगता है इसमें आप उतनी सहज नहीं हैं जितनी अन्‍य विधा में होती हैं। चूंकि मैं आपको अभिव्‍यक्ति में पढ़ चुका हूं इसलिए आप अपने रंग में एक रचना दें तो आनंद आ जाए, सादर

Comment by shashi purwar on March 21, 2013 at 11:18am

aap sabhi ka tahe dil se shukriya , ram ji , mukherji ji , kewal ji , brajesh ji ,

Comment by ram shiromani pathak on March 21, 2013 at 11:10am

इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें आदरणीय शशि जी!

Comment by coontee mukerji on March 21, 2013 at 1:41am

shashi ji , sundar kal kal bahti nadee to ab sapnon mein hi rah gae hai.iss sandesh ke liye bahut subkamnaen.sab ke dil tak apki baat pahooche

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