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ग़ज़ल एक कोशिश

1222 1222 1222 1222

तमन्ना है मेरी दिलबर मुझे थोड़ी वफ़ा दे दो।
महक जाऊ मैं गुलशन में मुझे ऐसी फिजा दे दो।।

दिए हैं लाख दुनियां ने मुझे जो ज़ख़्म सीने पर।
न हो अब दर्द मुझको यार कुछ ऐसी दवा दे दो
।।

किया है जुर्म हमने क्या मुझे भी तो पता चलता।
अगर माफ़ी न मिल सकती मुझे हमदम सज़ा दे दो।।


हुई है बेवफाई मुझ से भी अब क्या जहां वालो।
अगर लगता तुम्हे ऐसा मुझे उसकी सज़ा दे दो।।


जुदा होकर मुझे जीना नहीं उनके बिना हरगिज़। 
मिले मेरा सनम मुझको , मुझे ऐसी दुआ दे दो।।

केतन परमार (अनजान )

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 1068

Comment

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Comment by Ketan Parmar on August 9, 2013 at 2:15pm
Dr. lalit singh sir ji aap se tarif paa kar ye rachna dhany hui. Apka marg darshan nahi hota toh yaha tak ka safar mumkin nahi tha. samay samay par protsahan diyaa hai aapne abhaar sweekare
Comment by Ketan Parmar on August 9, 2013 at 2:12pm
aadarniy shijju ji waha par ek coma nahi diyaa hai uske liye maafi chahunga
Comment by Neeraj Nishchal on August 9, 2013 at 10:26am
बहुत सुन्दर बहुत उम्दा
Comment by Neeraj Nishchal on August 9, 2013 at 10:26am
बहुत सुन्दर बहुत उम्दा
Comment by annapurna bajpai on August 8, 2013 at 11:24pm

adarniy ketan ji sundar gazal rachna ke liye bahut badhai apko .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on August 8, 2013 at 10:08pm

///तमन्ना है मेरी दिलबर मुझे थोड़ी वफ़ा दे दो।
महक जाऊ मैं गुलशन में मुझे ऐसी फिजा दे दो।।

दिए हैं लाख दुनियां ने मुझे जो ज़ख़्म सीने पर।
न हो अब दर्द मुझको यार कुछ ऐसी दवा दे दो
।।///

वाह केतन जी आपने तो कमाल कर दिया ,इस शानदार ग़ज़ल के लिए दिली दाद क़ुबूल करें

//जुदा होकर मुझे जीना नहीं उनके बिना हरगिज़। 

मिले मेरा सनम मुझको मुझे ऐसी दुआ दे दो//

इसमे ''मुझको'' और ''मुझे'' एक साथ लिखना कुछ अजीब सा लग रहा है, केतन जी एक पाठक के तौर पे ये मेरा निजी विचार है, उम्मीद है इसे आप अन्यथा नही लेंगे.

Comment by Dr Lalit Kumar Singh on August 8, 2013 at 9:19pm

अति सुन्दर आ. केतन जी 

 सादर 
Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on August 8, 2013 at 7:23pm

Kya khoob Aadaraniy Ketan ji. Bilkul saras aur pravah yukt. Badhaiya

Comment by Ketan Parmar on August 8, 2013 at 7:19pm

DIDI AAPKA SUKR GUZAAR HOO

Comment by कल्पना रामानी on August 8, 2013 at 7:01pm

सुंदर गजल के लिए बधाई आपको, केतन जी

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