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चंद शेर - प्यार पर -- डॉo विजय शंकर

चलो ये अच्छा हुआ कि प्यार अंधा होता है
वर्ना किस किस से उसे दो चार होना पड़ता ||

पंखुड़ी गुलाब मासूमियत जिसके नाम है
झूठ फरेब धोखा सब उसे देखना पड़ता ||

जिसकी मरने जीने की लोग कसमें खाते हैं
उस प्यार को कभी खुद शहादत में आना पड़ता ||

प्यार जिसके फैसले पे लोग मर मिट जाते हैं
अदालती कटघरे में उसे खड़ा रहना पड़ता ||

दुनियाँ सब देख के अंधी बनी रहती है
प्यार को भी ऐसा ही गुनाह करना पड़ता ||

मौलिक एवं अप्रकाशित
डॉo विजय शंकर

Views: 505

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Comment by Dr. Vijai Shanker on April 14, 2015 at 9:06am
प्रिय मिथिलेश जी , अश'आर आपको अच्छे लगे , जान कर अच्छा लगा , आभार, आपको बहुत बहुत धन्यवाद, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 14, 2015 at 7:29am
आदरणीय विजय शंकर सर बहुत खूब। अच्छे अशआर। शानदार। दाद ही दाद।
Comment by Dr. Vijai Shanker on April 13, 2015 at 6:12pm
आदरणीय राजकुमार आहूजा जी ,आपकी स्वीकृति के लिए आपका बहुत बहुत आभार , धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on April 13, 2015 at 6:09pm
आदरणीय समर कबीर साहब , सादर नमस्कार, स्वीकृति के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया , सादर।
Comment by rajkumarahuja on April 13, 2015 at 3:56pm

माननीय डा. विजय शंकर जी , बहुतखूब ...! जमाने से सुनते आये हैं  कि इश्क़ में सब ज़ायज़ है ! शायद यही वज़ह होगी कि,  दौरे-इश्क़ में आज  बस नाजायज़ ही नाजायज़ है !,,,,,,,,सादर 

Comment by Samar kabeer on April 13, 2015 at 10:58am
आली जनाब डा.विजय शंकर जी,आदाब,प्यार के जज़्बात से भरे अच्छे अशआर के लिये बधाई स्वीकार करें |
Comment by Dr. Vijai Shanker on April 13, 2015 at 5:22am
प्रिय जीतेन्द्र जी , आपको पसंद आया , आपका बहुत बहुत आभार एवं बधाई हेतु धन्यवाद, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on April 13, 2015 at 5:21am
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , आपका आभार एवं धन्यवाद, सादर।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 12, 2015 at 9:20pm

आपकी गजल में,  आपकी अतुकांत से निर्देश दिखाई पड़ते है ,सर. मतला बहुत सुंदर कहा आपने. तहे दिल से बधाई लीजिये आदरणीय डा.विजय जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 12, 2015 at 9:01pm

आदरणीय विजय भाई , सुनद भाव पूर्ण शे र हुये हैं , हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें ॥

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