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दुनियाँ क्या से क्या हो गई-- डॉo विजय शंकर।

दुनियाँ,क्या से क्या
हो गई,
रफ़्तार, हवा से तेज
हो गई ,
जिंदगी, बस एक रेस
हो गई ,
मेहबूब की बातें,
मेहबूब से बातें ,
ग़ज़ल न जाने कहाँ ग़ुम
हो गई,
इश्क न जाने कहाँ खो गया
अफेयर का ज़माना हो गया ,
चलते हैं ,
बदलते हैं ,
कितने फेयर होते हैं ,
जफ़ा को अब कोई रोता नहीं ,
जिक्रे वफ़ा अब कहीं होता नहीं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on October 8, 2015 at 10:59am
आदरणीय सतविंदर कुमार जी , प्रस्तुति पर आपकी उपस्थिति एवं प्रशस्ति के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 8, 2015 at 10:57am
आदरणीय कांता रॉय जी , आपकी विवेचनाएं गम्भीर होती हैं , आपकी इस प्रस्तुति की प्रशस्ति के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 8, 2015 at 10:54am
प्रिय कृष्ण मिश्रा जी , प्रशस्ति के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 7, 2015 at 8:54pm
जफ़ा को अब कोई रोता नहीं ,और जिक्रे वफ़ा होता नहीं।बहुत सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय जी
Comment by kanta roy on October 7, 2015 at 1:04pm

दुनियाँ,क्या से क्या
हो गई,
रफ़्तार, हवा से तेज
हो गई ,
जिंदगी, बस एक रेस
हो गई ,.......वाह ! बहुत खूब कही है आपने , वाकई दुनिया हवा से तेज हो गयी है अब।  दिल की बातें सुनने को किसको फुर्सत। जो ठहर गये वही अब बर्बाद है।  बधाई आपको तहेदिल आदरणीय डा. विजय शंकर जी इस सुन्दर रचना के लिए। 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 7, 2015 at 12:22pm
बहुत सुन्दर रचना हुयी है आ विजय सर।अंतिम पंक्तियाँ ही काफी है आज के परिदृश्य को बयाँ करने के लिए। हार्दिक बधाई।
सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 7, 2015 at 8:35am
आदरणीय डॉo आशुतोष मिश्र जी , प्रस्तुति पर आपकी उपस्थिति के लिए आभार एवं प्रशस्ति के लिए बहुत बहुत धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 7, 2015 at 8:31am
आदरणीय गिरीराज भंडारी जी , आपकी पकड़ के लिए बहुत बहुत आभार , हालात और आयाम तो बड़ी तेजी से बदल ही रहे हैं , प्रस्तुति पर आपकी उपस्थिति के लिए
धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 6, 2015 at 12:52pm

आदरणीय विजय सर  बर्तमान परिदृश्य को उकेरती शानदार शसक्त रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 6, 2015 at 12:09pm

आदरणीय विजय शंकर भाई , कटु सत्य बयान किया है आपने , लिव इन रिलेशन के जमाने में कौन किसमे वफा तलाशे । सब, तू नही और सही विचारों के मानने वाले हैं । सुनदर रचना के लिये हार्दिक बधाई आपको ।

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