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घुमावदार प्रश्न -- ( लघु-कथा ) -- डॉo विजय शंकर

अधिकारी - सर , इस बार पब्लिक ने जो प्रश्न उठाया है , वह बड़ा घुमावदार है। कोई हल मिल नहीं रहा है।
माननीय नेता जी - फिर तो बड़ा अच्छा है , हम भी उसे घुमाते रहेंगे। घुमाते-घुमाते उसे ही घुमा देंगे।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2016 at 10:34am
आभार एवं धन्यवाद , आदरणीय राम शर्मा जी , सादर।
Comment by Ram Sharma on July 21, 2016 at 12:04pm
गजब... दो पंक्तियों में इतनी बड़ी बात !! वाह जी
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 20, 2016 at 6:23pm
आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी , अच्छा लगा आपकी टिप्पणी पढ़ कर। लघु-कथा दो तीन पंक्ति की भी हो सकती है , इसमें कोई संदेह नहीं। नीति गत बातें तो एक दो शब्द में ही बोल कर निपटा दी जाती हैं। हाँ उनमें छुपे मर्म समझ में आने चाहिए। आपकी प्रशस्ति के लिए ह्रदय से आभार और धन्यवाद। सादर।
Comment by Ashok Kumar Raktale on July 20, 2016 at 1:25pm

यही होता रहा है हमेशा से घुमाने का खेल. इतनी छोटी लघुकथा पढने का पहला ही अवसर है. बहुत-बहुत बधाई आदरणीय डॉ.विजय शंकर साहब. सादर.

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