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अस्तित्व -- डॉo विजय शंकर

विशालता - सूक्ष्मता
का अनूठा संगम हैं प्रकृति,
हाथी भी है , चींटी भी है,
सूक्ष्म जीव , जीवाणु ,
कीट , कीटाणु भी हैं
दोनों का भोजन है ,
भूखा कोई नहीं है ,
इंसान को समझो ,
उसे न्यून मत करो ,
इतना न्यून तो
बिलकुल मत करो
कि वह सूक्ष्म हो जाए ,
और तुम्हें दिखाई भी न दे ,
कीटाणु की तरह ,
रोगाणु की तरह ,
रहेगा तब भी वह समाज में,
सोचो , क्या करेगा ?
समाज को ही रोगी करेगा।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on July 18, 2016 at 8:19am
आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी , आपकी विवेचना और प्रशस्ति ह्रदय साभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 18, 2016 at 8:19am
आदरणीय श्री सुनील जी , विवेचना और प्रशस्ति के लिए ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 18, 2016 at 8:16am
आदरणीय शेख सहजाद उस्मानी जी , विशद प्रशस्ति के लिए ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Ashok Kumar Raktale on July 18, 2016 at 8:08am

आदरणीय डॉ. विजय शंकर जी सादर बिलकुल ठीक कहा है आदमी के आदमी बने रहने में ही समाज की भलाई है. सादर.

Comment by shree suneel on July 18, 2016 at 3:08am
चिंतन-मनन के योग्य.. . बहुत ही सार्थक समर्थ प्रस्तुति.
इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक हार्दिक बधाई आपको आदरणीय डॉ विजय शंकर सर जी. सादर.
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 17, 2016 at 8:32am
सामान्य किन्तु तीखी सचेत करती, अहम मुद्दे उठाती सार्थक रचना के लिए हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय डॉ. विजय शंकर जी।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 17, 2016 at 3:33am
आदरणीय डॉo आशुतोष मिश्रा जी , आपकी समस्त बधाइयों के लिए ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 16, 2016 at 11:40pm
आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार , रचना आप तक अपने भाव पहुंचाने में सफल हुयी , आपने उसे मान दिया , आपका आभार , बधाई ढके लिए धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 16, 2016 at 11:40pm
आदरणीय सुश्री राहिला जी , रचना आपको कर सकी आभार , आपकी बधाई के लिए धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 16, 2016 at 3:46pm

आदरणीय विजय सर ..चिंतन के लिए प्रेरित करती इस शसक्त रचना के लिए ढेर सारी शुभकामनायें स्वीकार करें सादर प्रणाम के साथ 

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