आदरणीय साथियो,
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आदरणीय शेख शहजादजी
पूरी कथा और इस कथा का भाव मेरी समझ से बाहर है। गुणीजन ही इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। विद्यालय में रोज ही यही सब होता है तो उस दिन नया क्या हुआ। लो बेटा अब लेना मजे मासाब की सजा में ..... प्राथमिक शाला के बच्चे एक दूसरे को बेटा कहकर संबोधित करते हैं ... आश्चर्य !!
हार्दिक धन्यवाद मेरे इस प्रयास पर आपकी प्रतिक्रिया और सुझाव हेतु। आजकल के परिवेश में 'बेटा' या 'यार' शब्द सामान्य या तंजदार बोलचाल में हर उम्र के हर लिंग के लोगों में संभव है।
आदरणीय अखिलेश जी
लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर स्पष्ट कहे जाना लघुकथा का चरित्र नहीं है। इस लघुकथा में हमारे विद्यालयों की दशा एक विसंगति है और चपरासी के संवादों के पीछे इसका अनकहा छिपा है। चपरासी और स्कूल व्यवस्था इस बात के लिए स्वयं को उत्तरदायी नहीं मान रहे कि पढाई नहीं हुई या खाना नहीं बना उल्टे बच्चों को ही झाड़ू नहीं लगाने और ताला नहीं खोलने के लिए डाँट रहे हैं। उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे.यही भाव है इस लघुकथा का।
आदाब। रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी रचना का मर्म और अनकहे के एक पहलू को स्पष्ट करती समीक्षा हेतु और प्रोत्साहन हेतु तहेदिल बहुत-बहुत शुक्रिया। कृपया शीर्षक पर भी अपनी राय दीजियेगा यदि समय मिल सके, तो।
आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती अच्छी लघुकथा आपने लिखी है. किन्तु कुछ बातें जो मुझे लगता है सुधार होना चाहिए. जैसे लघुकथा का प्रथम वाक्य बहुत लंबा और पेचीदा है. कई बार पढने पर भी समझ पाना मुश्किल हो रहा है. कुछ वाक्य जिन्हें सरल किया जा सकता था. जैसे//"मध्याह्न भोजन अभी कर लेते हैं रसोई वाली चाची से कहकर"// इसे // रसोई वाली चाची से कहकर मध्याह्न भोजन अभी कर लेते हैं.// करने से पाठक सहजता अनुभव करेगा. वैसे ही //"लो बेटा, अब लेना मज़े मासाब की सज़ा में इंटरवल में!"// इस वाक्य में// सज़ा में इंटरवल में // यह ठीक नहीं है. इस वाक्य को भी // लो बेटा, अब लेना मजे इंटरवल में मास्साब की सज़ा के// इस तरह किया जाना उचित होगा. सादर
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