For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,


जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर नव-हस्ताक्षरों, के लिए अपनी कलम की धार को और भी तीक्ष्ण करने का अवसर प्रदान करता है. इसी क्रम में प्रस्तुत है :

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182

विषय : "आरंभ और अंत"

आयोजन 17 जनवरी 2026, दिन शनिवार से 18 जनवरी 2026, दिन रविवार की समाप्ति तक अर्थात कुल दो दिन.
ध्यान रहे : बात बेशक छोटी हो लेकिन 'घाव करे गंभीर’ करने वाली हो तो पद्य- समारोह का आनन्द बहुगुणा हो जाए. आयोजन के लिए दिये विषय को केन्द्रित करते हुए आप सभी अपनी मौलिक एवं अप्रकाशित रचना पद्य-साहित्य की किसी भी विधा में स्वयं द्वारा लाइव पोस्ट कर सकते हैं. साथ ही अन्य साथियों की रचना पर लाइव टिप्पणी भी कर सकते हैं.

उदाहरण स्वरुप पद्य-साहित्य की कुछ विधाओं का नाम सूचीबद्ध किये जा रहे हैं --

तुकांत कविता, अतुकांत आधुनिक कविता, हास्य कविता, गीत-नवगीत, ग़ज़ल, नज़्म, हाइकू, सॉनेट, व्यंग्य काव्य, मुक्तक, शास्त्रीय-छंद जैसे दोहा, चौपाई, कुंडलिया, कवित्त, सवैया, हरिगीतिका आदि.

अति आवश्यक सूचना :-

रचनाओं की संख्या पर कोई बन्धन नहीं है. किन्तु, एक से अधिक रचनाएँ प्रस्तुत करनी हों तो पद्य-साहित्य की अलग अलग विधाओं अथवा अलग अलग छंदों में रचनाएँ प्रस्तुत हों.
रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना अच्छी तरह से देवनागरी के फॉण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें.
रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे अपनी रचना पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं.
प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें.
नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति को बिना कोई कारण बताये तथा बिना कोई पूर्व सूचना दिए हटाया जा सकता है. यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
सदस्यगण बार-बार संशोधन हेतु अनुरोध न करें, बल्कि उनकी रचनाओं पर प्राप्त सुझावों को भली-भाँति अध्ययन कर संकलन आने के बाद संशोधन हेतु अनुरोध करें. सदस्यगण ध्यान रखें कि रचनाओं में किन्हीं दोषों या गलतियों पर सुझावों के अनुसार संशोधन कराने को किसी सुविधा की तरह लें, न कि किसी अधिकार की तरह.

आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है. लेकिन बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता अपेक्षित है.

इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.

रचनाओं पर टिप्पणियाँ यथासंभव देवनागरी फाण्ट में ही करें. अनावश्यक रूप से स्माइली अथवा रोमन फाण्ट का उपयोग न करें. रोमन फाण्ट में टिप्पणियाँ करना, एक ऐसा रास्ता है जो अन्य कोई उपाय न रहने पर ही अपनाया जाय.

फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो 17 जनवरी 2026, दिन शनिवार लगते ही खोल दिया जायेगा।

यदि आप किसी कारणवश अभी तक ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार से नहीं जुड़ सके है तो www.openbooksonline.com पर जाकर प्रथम बार sign up कर लें.

महा-उत्सव के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है ...
"OBO लाइव महा उत्सव" के सम्बन्ध मे पूछताछ

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" के पिछ्ले अंकों को पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक करें

मंच संचालक

मिथिलेश वामनकर
(सदस्य टीम प्रबंधन)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम परिवार

Views: 219

Replies are closed for this discussion.

Replies to This Discussion

दोहा मुक्तक. . . . .

आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।
साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख ।
दिखता है  आरम्भ पर, ओझल रहता अन्त -
वैसी   मिलती   जिंदगी, जैसे   होते  लेख ।
***
आदि भाल पर  अंत की,  कथा  लिखी  बेअंत ।
अमिट गमन हर जीव का, क्या राजा क्या संत ।
संग   खुशी   के  वेदना, सब  जीवन   के   रंग –
नियत समय पर जीव को, मिलता अंत अनन्त ।

मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक पंक्ति शीर्षक को सार्थकता से विवेचित कर रही है। 

  

संग खुशी के वेदना, सब जीवन के रंग –
नियत समय पर जीव को, मिलता अंत अनन्त
इन पंक्तियों ने भारतीय दर्शन को कितनी सहजता से साझा किया है ! वाह वाह !

इस प्रस्तुति पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें, आदरणीय।
 
एक बात,
दूसरे मुक्तक के दूसरे सम चरण में आपने ’क्या राजा क्या संत’ कहा है। इसमें किसी तरह की कोई वैधानिक त्रुटि है भी नहीं।

वस्तुतः, राजा के साथ द्वंद्वात्मक शब्द रंक अत्यंत ही प्रचलित है। जिसे अपना मस्तिष्क वाचन के प्रवाह में उसी तौर पर मानता हुआ भी पढ़ता चलता है। किन्तु, आपकी रचना राजा के साथ संत का प्रयोग करती है, जिस कारण वाचन के क्रम में एक अटपटापन-सा बनता है। इसे ’क्या नृप क्या ही संत’ कर सहज ही साधा जा सकता है। नृप और संत का समुच्चय द्वंद्वात्मक न होने से वाचन प्रवाह में कोई बाधा भी नहीं बनने पाती। 
आपकी प्रस्तुति पर पुनः हार्दिक बधाई 

आदरणीय सौरभ जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । आपका संशय और सुझाव उत्तम है । इसके लिए हार्दिक आभार आदरणीय जी ।

आ. भाई सुशील जी , सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहा मुक्तक रचित हुए हैं। हार्दिक बधाई। 

दोहा पंचक  . . . आरम्भ/अंत

अंत सदा  आरम्भ का, देता कष्ट  अनेक ।
हरती यही विडम्बना , जीवन भरा  विवेक ।।

साँसों का आरम्भ है, जीवन का प्रारम्भ ।
अंत दिशा में जीव को, झोंके उसका दंभ ।।

कब होता आरम्भ से ,कभी अंत का भान ।
साँसों के  अंजाम से , गाफिल क्यों इंसान ।।

सही दिशा आरम्भ को, देती नया प्रभात ।
जीवन की कठिनाइयाँ, फिर खाती हैं मात ।।

सदा  सही आरम्भ को , मिले शिखर सम्मान ।
छुपा हुआ आरम्भ में, जीवन का उत्थान ।।

मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है।
हर दोहा आरंभ-अंत की मान्यता और आजतक इस क्रम में हुई विवेचनाओं को शाब्दिक कर रहा है। 

 
साँसों का आरम्भ है, जीवन का प्रारम्भ ... इस पंक्ति में आरंभ और प्रारंभ के तार्किक प्रयोग ने मुझे देर तक बाँधे रखा।
हार्दिक बधाई स्वीकार करें, आदरणीय
शुभातिशुभ 

आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सृजन समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार 

अंत या आरंभ 

---------------

ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संत
हो गया आरंभ जिसका, है अटल फिर अंत
अंततः है अंत होना, जो हुआ आरंभ
देखते हैं नित्य फिर भी, है हृदय में दंभ

प्रथम पग से पूर्व रखना, ध्यान में ही लक्ष्य

नष्ट होना ही नियत है, सृजन का गंतव्य
सृष्टि का भी अटल रहना, है प्रकृति विपरीत
मात्र परिवर्तन नियम है, कुछ न कालातीत

पंचभौतिक तत्त्व सारे, लौट जाते मूल
मूल से ही पुनः खिलते, हैं सृजन के फूल
चक्र यह आवागमन का, कब हुआ अवरुद्ध
जो इसे स्वीकार कर ले, है वही तो बुद्ध

शत्रुता शाश्वत नहीं है, और ना ही प्रीत
हार भी अंतिम नहीं है, और ना ही जीत
पुण्य भी हैं क्षीण होते, सकल कटते पाप
तम न रहता ना प्रकाश ही, शीत ना ही ताप

ज्ञान स्थाई कब हुआ है, कब हुआ अज्ञान
सभ्यता स्थाई हुई कब, और कब विज्ञान
प्रत्येक परिवर्तन लिवाता, इक नया आरंभ
अंत से लिपटा हुआ है, सदा पुनरारंभ

ऊर्जा होकर परिवर्तित, बदल रही बस रूप
करे आत्मा भी यही तो, बदले बस स्वरूप
सदा के लिए ये दोनों, होती कब विलीन
कुछ नहीं अंतर कहें जब, कृष्ण-आइन्स्टीन

#मौलिक एवं अप्रकाशित 

प्रस्तुत रचना को रूपमाला छंद पर लिखा गया है। इस छंद के प्रयोग और विधान का जितना मुझे पता लग सका उसे अधिकतम निभाने  का प्रयास किया है। फिर भी त्रुटियाँ रह जानी स्वाभाविक हैं। आप गुणीजनों की ओर से उचित मार्गदर्शन अपेक्षित है।

अग्रिम धन्यवाद सहित

रूपमाला छंद : (14,10) x 4; पदांत 21 से

(इसे मदन छंद भी कहते हैं। 2122 2122, 2122 21 सरल विन्यास का एक रूप ) 

जानकारी स्रोत: ओबीओ तथा अन्य ऑनलाइन मंच 


आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान भी स्पष्ट किये हैं, यह उचित भी है। यह अवश्य है कि अपने मंच पर इस छंद पर आपने आदरणीय अम्बरीष जी केआलेख को देखा हो। विधान को उचित ढंग स्पष्ट किया गया है।

 

ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संत .. इस पद के विषम चरण की कुल मात्रा की गणाना करें, जो चौदह से एक कम तेरह हो रही है।  ऋषि का ऋ लघुमात्रिक है, जिसे संभवतः आपने गुरु मान लिया है।

 

अब कुछ पंक्तियों की मात्रा-गणना पर आपकी दृष्टि चाहूँगा -
तम न रहता ना प्रकाश ही, शीत ना ही ताप .
प्रत्येक परिवर्तन लिवाता, इक नया आरंभ
ऊर्जा होकर परिवर्तित, बदल रही बस रूप
आदि

 

एक बात और, आप पंक्तियों की मात्रा-गणना पर काम करने के साथ-साथ शब्दकलों को लेकर भी स्वयं में स्पष्ट रहें। आपको मैंने एक सार्थक छंद अध्यवसायी के तौर पर देखा है। चूँकि गेयता छांदसिक रचनाओं खी आत्मा होती है। अतः, आप जानें कि शब्दकल की समझ के बिना छंदों की गेयता पर सिद्धहस्तता प्राप्त नहीं हो सकती। इसका अर्थ है, कि केवल लघु और गुरु वर्णों की व्यवस्था और मात्रिकता के निर्धारण से गेयता का निर्वहन नहीं हो सकता है। मैं ऐसा इसलिए निवेदन कर रहा हूँ कि आपने विधान साझा करने के क्रम में 2122 2122, 2122 21 के विन्यास को उद्धृत किया है।

 

निम्नलिखित तुकान्तता पर भी आपका ध्यान चाहूँगा -

प्रथम पग से पूर्व रखना, ध्यान में ही लक्ष्य
नष्ट होना ही नियत है, सृजन का गंतव्य

इन पंक्तियों को निम्नलिखित रूप दिया जा सकता है -
प्रथम पग से पूर्व रखना, ध्यान में भवितव्य
नष्ट होना ही नियति है, सृजन का गंतव्य

 

बहरहाल, आपके सार्थक और सदिश प्रयास पर मन मुग्ध है। आपकी चेष्टा सफलीभूत हो..

 

कुछ नहीं अंतर कहें जब, कृष्ण-आइन्स्टीन ... वाह वाह वाह ...
 
शुभातिशुभ

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

amita tiwari posted a blog post

निर्वाण नहीं हीं चाहिए

निर्वाण नहीं हीं चाहिए---------------------------कैसा लगता होगाऊपर से देखते होंगे जबमाँ -बाबाकि…See More
3 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . .अधर

दोहा पंचक. . . . . अधरअधरों को अभिसार का, मत देना  इल्जाम ।मनुहारों के दौर में, शाम हुई बदनाम…See More
3 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सभी सदस्यों को सादर सप्रेम राधे राधे सभी चार आयोजन को को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। ( 1…"
7 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"चर्चा से कई और पहलू, और बिन्दु भी, स्पष्ट होंगे। हम उन सदस्यों से भी सुनना चाहेंगे जिन्हों ने ओबीओ…"
yesterday
pratibha pande replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"आदरणीय मिथिलेश जी के कहे से मैं भी सहमत हूँ। कैलेंडर प्रथम सप्ताह में आ जाय और हफ्ते बाद सभी आयोजन…"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सभी आदरणीय को नमस्कार। आदरणीय तिलक राज कपूर जी का ये उत्तम विचार है। अगर इसमें कुछ परेशानी हो तो एक…"
Friday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .युद्ध

दोहा सप्तक. . . . . युद्धहरदम होता युद्ध का, विध्वंसक परिणाम ।बेबस जनता भोगती ,  इसका हर  अंजाम…See More
Friday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"इस सारी चर्चा के बीच कुछ बिन्दु और उभरते हैं कि पूरे महीने सभी आयोजन अगर ओपन रहेंगे तो…"
Friday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"आदरणीय, नमस्कार  यह नव प्रयोग अवश्य सफलता पूर्वक फलीभूत होगा ऐसा मेरा विश्वास है तथा हमें…"
Thursday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सुझाव सुन्दर हैं ।इससे भागीदारी भी बढ़गी और नवीनता भी आएगी । "
Thursday

मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi" replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
" कृपया और भी सदस्य अपना मंतव्य दें ।"
Wednesday
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"तरही का मुख्य उद्देश्य अभ्यास तक सीमित है, इस दृष्टि से और बहरों पर भी तरही मिसरे देना कठिन न होगा…"
Mar 11

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service